बुरहानपुर। शहर में कॉलोनी काटकर गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों को प्लॉट देने के नाम पर राशि लेने और बाद में उसी जमीन का दूसरे व्यक्ति से सौदा करने का गंभीर मामला सामने आया है। वर्ष 2013-14 में अपनी मेहनत की कमाई लगाकर प्लॉट खरीदने वाले लोग आज भी जमीन और जमा राशि के लिए भटक रहे हैं। करीब 13 साल तक आश्वासन और चक्कर मिलने के बाद गुरुवार को पीड़ितों का सब्र टूट गया। महेश सिंह चौहान सहित अन्य लोगों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिला प्रशासन के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उनसे ड्रॉ सिस्टम के माध्यम से प्लॉट देने के नाम पर किश्तों में राशि जमा कराई गई। वर्षों तक उन्हें भरोसा दिलाया गया कि जल्द प्लॉट आवंटित कर रजिस्ट्री कराई जाएगी, लेकिन समय बीतता गया और खरीदारों के हाथ केवल आश्वासन ही लगा। न उन्हें प्लॉट मिला और न ही उनकी पूरी रकम वापस की गई।
मजदूरी की कमाई लगाई, अब दफ्तरों के चक्कर
महेश सिंह चौहान ने बताया कि लोकेश पिता अशोक सुगंधी, रूपेश भगवानदास शाह, महेंद्र बालमुकुंद शाह सहित कई लोगों ने ग्राम फतेहपुर की अहमदनगर कॉलोनी में प्लॉट खरीदे थे। खरीदारों ने अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार किश्तों में राशि जमा की। इनमें अधिकांश लोग गरीब और मजदूर वर्ग से हैं, जिन्होंने छोटा-सा मकान बनाने का सपना देखकर वर्षों की बचत कॉलोनी में लगा दी थी। पीड़ितों के अनुसार कॉलोनी से जुड़े लोगों ने राशि लेने के बाद भी प्लॉट का आवंटन नहीं किया। खरीदार जब भी प्लॉट या रजिस्ट्री की बात करते, उन्हें नई तारीख और नया भरोसा देकर लौटा दिया जाता। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह सिलसिला एक-दो वर्ष नहीं, बल्कि करीब 13 से 14 साल से चल रहा है।
आरोप—जिन प्लॉटों के लिए पैसा लिया, वही जमीन दूसरे को बेची
शिकायत में डॉ. एसएम सादिक पिता मेहबूब, जकी हाशमी, युसूफ पिता हिफाजत सहित अन्य लोगों के नामों का उल्लेख किया गया है। पीड़ितों का आरोप है कि ग्राम फतेहपुर स्थित खसरा नंबर 351 और 353 की अहमदनगर कॉलोनी की जमीन बाद में नरेश पुनीवाला को अच्छे दाम में बेच दी गई। खरीदारों ने सवाल उठाया कि जब उनसे प्लॉट देने के नाम पर राशि पहले ही ली जा चुकी थी, तो वही जमीन किसी अन्य व्यक्ति को कैसे बेची गई? जमीन का सौदा होने के बाद भी खरीदारों को इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई और उन्हें लगातार चक्कर कटवाए जाते रहे। शिकायतकर्ताओं ने इसे गरीबों के साथ छल और कथित धोखाधड़ी बताते हुए कहा कि कॉलोनी से जुड़े लोगों ने जमीन बेचकर लाभ कमा लिया, जबकि वर्षों पहले रकम जमा करने वाले खरीदार आज भी अपने अधिकार के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।
पीड़ित बोले—अब प्लॉट नहीं तो ब्याज सहित पैसा लौटाएं
पीड़ितों ने प्रशासन से मांग की कि मामले से जुड़े दस्तावेज, रसीदें, भूमि का रिकॉर्ड, हुए सौदे और राशि के लेन-देन की जांच कराई जाए। यदि जमीन किसी अन्य व्यक्ति को बेची जा चुकी है और खरीदारों को प्लॉट देना संभव नहीं है तो उनकी जमा राशि ब्याज सहित वापस दिलाई जाए। साथ ही जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार आपराधिक और प्रशासनिक कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में कोई कॉलोनाइजर गरीबों की जीवनभर की कमाई को इस तरह जोखिम में न डाल सके। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वे लंबे समय तक आपसी सहमति से समाधान होने की उम्मीद लगाए बैठे रहे, लेकिन हर बार उन्हें केवल समय मांगा गया। अब उनके सामने प्रशासन और कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
पहले भी शिकायतें, फिर भी नहीं टूटा मनमानी का सिलसिला
बताया जा रहा है कि संबंधित कॉलोनाइजरों के खिलाफ पूर्व में भी प्लॉट और राशि से जुड़े मामलों की शिकायतें सामने आती रही हैं। कुछ प्रकरणों में शिकायतकर्ताओं को पैसा वापस किए जाने की बात भी सामने आई है, लेकिन इसके बावजूद कई लोग अब तक अपनी जमा पूंजी के लिए भटक रहे हैं। यह स्थिति प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है। यदि एक ही कॉलोनी या उससे जुड़े लोगों के खिलाफ लगातार शिकायतें आती रही हैं, तो समय रहते भूमि के सौदों, कॉलोनी की वैधता, प्लॉट बुकिंग और खरीदारों से ली गई राशि की व्यापक जांच क्यों नहीं की गई?
कॉलोनाइजर की सफाई—मेरा दोष नहीं, दायित्व निभाऊंगा
मामले में डॉ. एसएम सादिक ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि इसमें उनका कोई दोष नहीं है और उन्हें कानूनी प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा, “पहले भी पब्लिक का पैसा दिया गया है। हमारे परिसर में एक साथी ने कार्यालय खोला था। जिन्होंने कार्यालय खोला, यह काम उनके द्वारा किया गया था। फिर भी मेरा जो दायित्व बनता है, उसे मैं निभाऊंगा। मैं डॉक्टर हूं, गरीबों का पैसा व्यर्थ नहीं जाएगा। जल्द इस मामले का समाधान कराया जाएगा।” हालांकि पीड़ितों का कहना है कि वे इस तरह के आश्वासन वर्षों से सुनते आ रहे हैं। अब उन्हें मौखिक भरोसा नहीं, बल्कि रकम वापसी या प्लॉट आवंटन के रूप में ठोस समाधान चाहिए।
जनसुनवाई में बार-बार पहुंचते हैं कॉलोनियों के मामले
जिले की जनसुनवाई में प्लॉट, अवैध कॉलोनी, रजिस्ट्री और मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी शिकायतें लगातार सामने आती हैं। कहीं कॉलोनाइजर राशि लेने के बाद रजिस्ट्री नहीं करते तो कहीं प्लॉट बेचने के बाद सड़क, नाली, बिजली और पानी जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं। कई मामलों में एक ही जमीन के दोहरे सौदे, बिना अनुमति कॉलोनी काटने और रिकॉर्ड में गड़बड़ी के आरोप भी सामने आते रहे हैं। पूर्व में प्रशासन ने कुछ कॉलोनाइजरों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कराने की कार्रवाई की, लेकिन शिकायतों का सिलसिला कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है। सवाल यह है कि प्लॉट बेचते समय कॉलोनाइजरों के दस्तावेज, कॉलोनी की अनुमति और भूमि स्वामित्व की सख्ती से जांच क्यों नहीं होती? जब खरीदार सालों बाद शिकायत लेकर पहुंचते हैं, तब तक जमीन का स्वरूप बदल चुका होता है और कई बार वह किसी अन्य व्यक्ति के नाम हो चुकी होती है।
जांच के भरोसे पर टिकी 13 साल पुरानी उम्मीद
प्रशासनिक अधिकारियों ने आवेदन की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। अब पीड़ितों की नजर प्रशासन की जांच पर टिकी है। देखना होगा कि यह मामला भी फाइलों, नोटिसों और तारीखों के बीच उलझकर रह जाता है या 13 साल से अपनी मेहनत की कमाई के लिए भटक रहे लोगों को वास्तव में न्याय मिलता है। फिलहाल पीड़ितों का एक ही सवाल है—जब पैसा समय पर लिया गया था तो प्लॉट और पैसा लौटाने के लिए 13 साल क्यों लग गए?