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यदि संघ में आने से हीजड़े बनते हैं तो हमें हीजड़ा होना स्‍वीकार्य, नहीं बनना कांग्रेसी मर्द

कांग्रेस कह रही संघ में जो हैं वे सभी हीजड़े हैं जो मर्द हैं वे सभी कांग्रेसी डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्यप्रदेश कांग्रेस ने आठ जुलाई को अशोकनगर में न्याय सत्याग्रह नाम से प्रदेश सरकार के विरोध में कार्यक्रम किया। प्रदेश भर से नेता और कार्यकर्ता यहां पार्टी अध्यक्ष जीतू पटवारी पर दर्ज एफआईआर

On: July 9, 2025 2:50 PM
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  • कांग्रेस कह रही संघ में जो हैं वे सभी हीजड़े हैं जो मर्द हैं वे सभी कांग्रेसी

डॉ. मयंक चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश कांग्रेस ने आठ जुलाई को अशोकनगर में न्याय सत्याग्रह नाम से प्रदेश सरकार के विरोध में कार्यक्रम किया। प्रदेश भर से नेता और कार्यकर्ता यहां पार्टी अध्यक्ष जीतू पटवारी पर दर्ज एफआईआर के विरोध में गिरफ्तारी देने पहुंचे थे। इसी बीच ग्वालियर ग्रामीण कांग्रेस विधायक साहब सिंह गुर्जर ने मंच से कहा कि “जो मर्द थे वे जंग में आए, जो हिजड़े थे, वे संघ में गए। समझ गए न, इशारा ही काफी है।” यानी कि इनके हिसाब से जो भी राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ में कार्य कर रहे हैं, वे सभी हीजड़े हैं। अब बुरा लगनेवालों को बुरा लग सकता है, किंतु ऐसे भी बहुतेरे हैं, जिनका मानना है कि यदि कांग्रेस में जाने से ही मर्द बनते हैं तो हमें ऐसा मर्द नहीं बनना, जिनका अपने राष्‍ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण न हो। कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष जीतू पटवारी समेत कांग्रेस के प्रदेश भर से कई विधायकों के साथ नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्‍विजय सिंह सहित सभी बड़े कांग्रेसी नेता मौजूद थे। यानी कि जब यह बात कही जा रही थी तो किसी भी कांग्रेसी ने इसका विरोध नहीं किया, मतलब साफ है कि सभी का इस कथन को समर्थन रहा कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ में जो हैं वे सभी हीजड़े हैं और जो मर्द हैं वे सभी कांग्रेसी हैं।
वास्‍तव में देखा जाए तो यह इन कांग्रेसियों की बेशर्मी की हद है। क्‍योंकि ये सभी रास्‍वसंघ के उस त्‍याग को नकारना चाहते हैं जिसके परिणाम स्‍वरूप स्‍वयंसेवकों ने अपने अथक प्रयत्‍नों से भारत को शक्‍ति सम्‍पन्‍न राष्‍ट्र बनाने की दिशा में अपना सर्वस्‍व समर्पण कर दिया। एक तरह से देखा जाए तो यह उस तीसरी बिरादरी का भी अपमान है, जिसके अधिकारों के लिए भारतीय संविधान अ‍त्‍यधिक संवेदनशील है। क्‍योंकि जिस अर्थ में और जिस तरह से कांग्रेस अपने मंच से यह कह रही है, उस पर सभी को आपत्‍त‍ि होनी चाहिए ।
फिर भी यदि कोई कांग्रेस की परिभाषा में ही कहें कि संघ का स्‍वयंसेवक बन जाने से हीजड़ा बन जाना है तो यह हीजड़ा बनना वाकई में बुरा नहीं है। क्‍योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल का होने जा रहा है। 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। अपने स्‍थापना काल से लेकर विश्‍व का कोई संगठन नहीं, जिसने आज तक बिना किसी ठोस आधार के सबसे अधिक आलोचना सही हो। अब तक संघ के ख़िलाफ़ लगे सभी आरोप कपोल-कल्पना और झूठे साबित होते आए हैं। फिर भी कांग्रेस जैसे तमाम संगठन एवं लोग हैं जो आरएसएस को कोसते रहते हैं और जनमानस के बीच झूठा नैरेटिव गढ़ने का काम करते हैं।
कश्‍मीर विलयीकरण : स्वयंसेवकों ने मातृभूमि की रक्षा करने प्राणों की आहुती दी
आज जो संघ को हीजड़ा कह रहे हैं, उन्‍हें भी यह समझ लेना चाहिए कि देश हित में यदि वे भी हिजड़े बन जाएं तो इससे अच्‍छा कुछ हो नहीं सकता, क्‍योंकि वे संघ के स्वयंसेवकों ही थे जिन्‍होंने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण गवां दिए थे।
आज वास्‍तव में कांग्रेसियों को यह पता होना चाहिए कि जब कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही थी, तब देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने रास्‍वसंघ के दूसरे सर संघचालक गुरु गोलवलकर से मदद मांगी और गुरुजी श्रीनगर पहुंच गए, वे कश्‍मीर के महाराजा से मिले। इसके बाद ही महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेजा। पाकिस्‍तान के कबायली युद्ध के दौरान कश्मीर की तुरंत हवाईपट्टी के निर्माण का कार्य संघ के स्‍वयंसेवकों ने कर दिखाया था, जब जाकर वायु सेना अपने हवाई जहाज उतार पाई थी।
भारत विभाजन के वक्‍त स्‍वयंसेवकों ने सेवाकार्य में अपना जीवन लगाया
विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी और उन्‍हें समाप्‍त कर पाने में विफल हो गई, तब उसने भी रास्‍वसंघ के स्‍वयंसेवकों को सरकार की मदद करने की गुहार लगाई थी। वे रास्‍वसंघ ने स्‍वयंसेवक ही थे, जिन्‍होंने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे। सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा था। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी थी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता यह सभी कार्य संघ के स्‍वयंसेवक जीजान लगाकर कर रहे थे।
तब नेहरू भी विवश हो गए थे गणतंत्र परेड में स्‍वयंसेवकों को बुलाने
जिसके परिणाम स्‍वरूप स्‍वयं जवाहर लाल नेहरू अपने को रोक नहीं सके और तमाम विरोधी भाव रखने के बाद भी उन्‍हें देश सेवा के लिए स्‍वयंसेवकों के समर्पण के सामने झुकना पड़ा था। वर्ष 1963 की 26 जनवरी परेड में रास्‍वसंघ को शामिल होने का निमंत्रण उनके द्वारा दिया गया था। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए थे। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”
प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को भी मांगनी पड़ी थी संघ से मदद
कांग्रेसियों को यह पता होना चाहिए कि पाकिस्तान से युद्ध के समय भी देश के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को भी आरएसएस से मदद लेने की याद आयी थी। शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। इस युद्ध के दौरान हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।
कौन भुला सकता है दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय को
इसी तरह से वे संघ के स्‍वयंसेवक ही थे जिनकी दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में निर्णायक भूमिका रही। इतिहास में ये तरीख दर्ज है। वह 21 जुलाई 1954 का दिन था जब दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया। 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया। पूरा दादरा नगर हवेली क्षेत्र पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया गया।
इतिहास में यह भी दर्ज है कि कैसे संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने के रूप में सामने आई। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा मुक्‍त होकर सदैव के लिए भारत गणराज्‍य में विलय हो गया। इस पूरे आन्‍दोलन में कई स्‍वयंसेवक जेलों में प्रताड़‍ित हुए वह अपनी जगह है किंतु अनेक हुतात्‍मा हो गए थे।
आपातकाल में वे स्‍वयंसेवक ही थे जो लोकतंत्र बहाली के लिए जेल के अंदर और बाहर संघर्षरत् थे
कांग्रेस ये मत भूलना कि 1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में रास्‍वसंघ की भूमिका रही है। इस दौरान देश भर में सत्याग्रह के चलते लाखों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी हुई थी। संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाया। आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं–नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम रास्‍वसंघ कार्यकर्ताओं ने ही संभाला, यह आज किसी से छिपा नहीं है।
भैरों सिंह शेखावत : एक स्‍वयंसेवक का प्रयास बहुत बड़ा रहा, ऐसे अनेक स्‍वयंसेवक हुए हैं और हैं
जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने। 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक, और इसके आगे अब तक जितने भी संकट किसी भी रूप में भारत पर आए हैं, संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में स्‍वयंसेवक सेवा कार्य में सबसे आगे दिखाई देते हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि संघ करीब एक लाख से अधिक सेवा कार्य नियमित रूप से कर रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में भी संघ के सेवा कार्य नियमित रूप से चल रहे हैं। भव्‍य राममंदिर के स्‍वप्‍न का साकार होना आज हमारे सामने है ही।
पुरी की रथयात्रा में संघ के स्‍वयंसेवकों का सेवा कार्य भी एक बार देखें कांग्रेस
इसके साथ ही कांग्रेस को यह भी पता होना चाहिए कि हाल ही में हर वर्ष की भांति, इस वर्ष भी पुरी की प्रसिद्ध रथयात्रा के दौरान संघ के स्वयंसेवक यात्रा में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न सेवा कार्य करते रहे। रथ यात्रा 2025 के दौरान कुल 1,560 आरएसएस स्वयंसेवकों ने उत्कल विपन्न सहायता समिति के समन्वय में मानव सेवा की नौ प्रमुख योजनाओं का संचालन किया, जिनमें एम्बुलेंस कॉरिडोर बनाना, स्ट्रेचर सहायता, पीने का पानी वितरण, चिकित्सा सहायता, ट्रैफिक नियंत्रण और सफाई अभियान जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल रहे। इसके साथ ही, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, हिन्दू जागरण मंच, और भारतीय मजदूर संघ द्वारा भी पुरी के बड़ा दांड में सेवा कार्य किया जा रहा है। संघ के स्वयंसेवकों के इस तरह के सेवा कार्यों की प्रशंसा हो रही है।
कांग्रेस को नहीं भूलना चाहिए, भारत के परम वैभव के लिए साधनारत है संघ
बीते 99 सालों के दौरान संघ के स्‍वयंसेवक कई संगठनों के माध्‍यम से भारत के परम वैभव के लिए साधनारत हैं। आज 80 से अधिक देशों में रास्‍वसंघ काम कर रहा है। शिक्षा, समाज सेवा, प्रकाशन, थिंक टैंक जैसे तीन दर्जन से अधिक विषयों को लेकर संघ वर्षों के काम कर रहा है। भारतीय मजदूर संघ, मजदूरों के हितों को लेकर, किसानों के सरोकारों के लिए भारतीय किसान संघ, विद्यार्थ‍ियों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे अनेक संगठन आज कार्यरत हैं। अभी हाल ही में केशव कुंज दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक (04, 05, 06 जुलाई 2025) रविवार को संपन्न हुई है। आगे संघ की योजना क्‍या है, इसके बारे में प्रेस ब्रीफिंग द्वारा अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने सभी के बीच जानकारी प्रदान की।
संघ के शताब्‍दी वर्ष में ये है स्‍वयंसेवक की भूमिका
सुनील आंबेकर जी ने बताया कि रास्‍वसंघ शताब्दी वर्ष के दौरान समाज के सभी वर्गों की सहभागिता से ग्रामीण क्षेत्रों में मंडल और शहरी क्षेत्रों में बस्ती स्तर पर हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन किया जाएगा। वर्तमान में देश में संघ रचना से 58964 मंडल, 44055 बस्तियां हैं। हिन्दू सम्मेलनों में समाज के उत्सवों, सामाजिक एकता व सद्भाव के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके लिए समाज में सद्भाव-समरसता को बढ़ावा देने के लिए 11360 खंडों/नगरों में सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन होगा। संघ रचना के अनुसार देश के 924 जिलों में प्रमुख नागरिक गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा। समूह, व्यवसाय, वर्ग के अनुसार गोष्ठियों में भारत के विचार, भारत के गौरव, भारत के स्व आदि विषयों पर चर्चा होगी। वृहद गृह संपर्क अभियान के तहत हर गांव, हर बस्ती के अधिकतम घरों तक पहुंचने का प्रयास किया जाएगा। शताब्दी वर्ष के सारे कार्यक्रमों का उद्देश्य व्यापक आउटरीच है, भौगोलिक, सामाजिक दृष्टि से समाज के सभी लोगों तक जाना और सभी कार्यों में उनकी सहभागिता हो। यह अभियान एक तरह से सर्वसमावेशी, सर्वस्पर्शी होगा। विजयादशमी उत्सव से शताब्दी वर्ष का शुभारंभ होगा। देशभर में आयोजित विजयादशमी उत्सवों में सभी स्वयंसेवक शामिल होंगे।
पंच परिवर्तन के महत्‍व को कांग्रेस को भी समझना होगा
उन्‍होंने बताया कि पंच परिवर्तन यानी कि (1) स्व का बोध अर्थात स्वदेशी, (2) नागरिक कर्तव्य, (3) पर्यावरण, (4) सामाजिक समरसता एवं (5) कुटुम्ब प्रबोधन। इस पंच परिवर्तन कार्यक्रम को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाने के लिए रास्‍वसंघ प्रयासरत है। स्व के बोध से नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होंगे। नागरिक कर्तव्य बोध अर्थात कानून की पालना से राष्ट्र समृद्ध व उन्नत होगा। सामाजिक समरसता व सद्भाव से ऊंच-नीच जाति भेद समाप्त होंगे। पर्यावरण से सृष्टि का संरक्षण होगा तथा कुटुम्ब प्रबोधन से परिवार बचेंगे और बच्चों में संस्कार बढ़ेंगे। इस प्रकार पंच परिवर्तन आज समग्र समाज की आवश्यकता है।
स्वयंसेवकों के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे
उन्होंने कहा कि देश आगे बढ़ रहा है, आर्थिक व तकनीकी प्रगति कर रहा है। लेकिन केवल आर्थिक या तकनीकी दृष्टि से आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं है। हमारे समाज की विशेषताएं, राष्ट्र के अपने विशेष गुणों के साथ ही समाज के सभी लोगों की चिंता करना, पर्यावरण की चिंता करना, परिवार में जीवन मूल्यों की रक्षा करना, सामाजिक जीवन में आपसी सद्भाव बना रहे, पंच परिवर्तन के इन विषयों को समाज तक लेकर जाएंगे। इस संदेश को शताब्दी वर्ष के सारे कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में ले जाएंगे। इसके बारे में समाज सोचता है और उसमें सहभागी होता है तो हमारी यह प्रगति एकतरफा नहीं होगी और वह सर्वसमावेशी होगी, सबको साथ लेकर आगे बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि स्वयंसेवकों के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं।
वास्‍तव में यह कांग्रेस को पता होना चाहिए कि विश्व हिंदू परिषद, सेवा भारती, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व संवाद केंद्र, राष्ट्र सेविका समिति, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, हिंदू जागरण मंच, हिंदू स्वयंसेवक संघ, विवेकानंद केंद्र, विद्या भारती, सहकार भारती। अकेला विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है। ये 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 40 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और देढ़ लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं।
इसी तरह से संघ स्‍वयंसेवकों द्वारा संचालित अनेक संगठन हैं, जोकि आज भारत में ही नहीं विश्‍व के सबसे बड़े जन संगठन बन चुके हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है। हज़ारों एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए कई बच्चों को गोद लिया हुआ है, बिना किसी भेदभाव के कि यह किस धर्म, समाज वर्ग से आते हैं। इसी प्रकार के कई प्रकल्‍प उसके देश भर में संचालित हो रहे हैं, जोकि बच्‍चों से लेकर वृद्धों तक की देखरेख करने के लिए हैं।
1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आंदोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था. आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है। तब फिर एक बार जरूर सभी को विचार करना चाहिए कि जो भारत के लिए अपना सर्वस्‍व समर्पण करने में विश्‍वास रखते हैं।
वस्‍तुत: ऐसे संघ के स्‍वयंसेवकों को यदि मध्य प्रदेश के अशोक नगर में ग्वालियर ग्रामीण विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक साहब सिंह गुर्जर “हीजड़ा” बोल रहे हैं तो एक स्‍वयंसेवक अपने देश भारत के परम वैभव के लिए यह कहना भी स्‍वीकार करता है। देखा जाए तो ऐसे “हीजड़ा” बनने में किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए जिनके लिए राष्‍ट्र प्रथम और अंतिम है। यहां कहना होगा कि साहब सिंह गुर्जर या अन्‍य भी आरएसएस में आएंगे तो उनका भी राष्‍ट्र के लिए समर्प‍ित हो जाने की दिशा में स्‍वागत रहेगा।

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