नेपानगर। आजादी के 77 साल बीत गए… देश चांद पर पहुंच गया… लेकिन बुरहानपुर जिले के नेपानगर क्षेत्र की ग्राम पंचायत मांडवा के बोमलियापाठ गांव के बच्चे आज भी उस बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं, जिसे सरकार “शिक्षा का अधिकार” कहती है। गांव में सरकारी स्कूल नहीं है, इसलिए करीब 100 से 150 बच्चे कच्चे मकान में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यह सिर्फ व्यवस्था की लापरवाही नहीं… यह सीधे-सीधे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अफसर जिनकी कार्यप्रणाली हमेशा विवादों में रही है, अब अपने रिटायर्ड होने के दिन गिन रहे है।
गांव के बच्चों के पास स्कूल भवन नहीं है। पढ़ाई के नाम पर उन्हें कच्चे मकान में बैठाया जा रहा है। बारिश में छत टपकने का डर, गर्मी में दम घुटने की परेशानी और सर्दी में ठिठुरते हाथ… ऐसे हालात में पढ़ाई कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल नहीं होने से बच्चों की नियमित पढ़ाई नहीं हो पा रही, कई बच्चे धीरे-धीरे पढ़ाई छोड़ने की कगार पर पहुंच रहे हैं।
जयस ब्लॉक अध्यक्ष का आरोप: “कई बार शिकायत की… कोई सुनवाई नहीं”
जयस ब्लॉक अध्यक्ष मास्टर रावत ने साफ कहा कि बोमलियापाठ में स्कूल नहीं होने से कई बच्चे शिक्षा से वंचित रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस समस्या की जानकारी शासन-प्रशासन को कई बार दी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यानि बच्चों की पढ़ाई का मुद्दा सिस्टम के लिए जरूरी ही नहीं! जब गांव का बच्चा स्कूल से बाहर होगा, तो कल वही बच्चा मजदूरी करेगा, पलायन करेगा… या फिर व्यवस्था को कोसेगा।
सरकार नहीं जागी… तो वनरक्षक ने अपने खर्च पर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया
हैरानी की बात यह है कि जहां शासन-प्रशासन को स्कूल खोलना चाहिए था, वहां एक वनरक्षक ने अपने दम पर बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठा ली। वन ग्राम मांडवा में पदस्थ वनरक्षक कमलेश रघुवंशी ने अपने निजी प्रयास और खर्च से बच्चों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था करवाई। उन्होंने ना सिर्फ पढ़ाई शुरू करवाई, बल्कि शिक्षकों की व्यवस्था भी अपने स्तर पर की ताकि बच्चे पढ़ाई से कट न जाएं। यह पहल प्रेरणा है… लेकिन सवाल यह है कि सरकारी जिम्मेदारी निजी जेब से क्यों निभाई जा रही है?
हर महीने 3 हजार की मदद… एक छात्रा का सहारा बना वनरक्षक
वनरक्षक कमलेश रघुवंशी का प्रयास सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है। उन्होंने बोमलियापाठ की सीमा (पिता-दला) नाम की छात्रा को हर महीने 3 हजार रुपए की आर्थिक सहायता देना भी शुरू किया है। यह मदद उस बच्ची के लिए उम्मीद बन गई है, जो गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण पढ़ाई छोड़ सकती थी।
26 जनवरी पर 150 बच्चों को स्वेटर… ताकि ठंड में भी न रुके पढ़ाई
26 जनवरी को वनरक्षक रघुवंशी ने गांव के 100 से 150 बच्चों को ठंड से बचाने के लिए स्वेटर बांटे। इससे बच्चों को राहत मिली और पढ़ाई जारी रहने में मदद हुई। वनरक्षक के इस मानवीय कदम की ग्रामीणों ने सराहना की… लेकिन साथ ही यह भी कहा कि शासन का काम अब भी अधूरा है।
ग्रामीणों की दो टूक: “स्कूल बनाओ… नहीं तो आने वाली पीढ़ी अंधेरे में चली जाएगी”
गांव में शिक्षा की हालत देखकर साफ है कि बोमलियापाठ में जल्द से जल्द सरकारी स्कूल भवन निर्माण की जरूरत है। मास्टर रावत ने मांग की कि गांव में सरकारी स्कूल की मंजूरी देकर तुरंत निर्माण कार्य शुरू कराया जाए, ताकि बच्चों को सुरक्षित और बेहतर माहौल में पढ़ाई मिल सके।