बुरहानपुर। कभी अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए भी घर से पैसे लेने पड़ते थे। आमदनी महज ₹8 से 10 हजार प्रतिमाह थी और परिवार की जरूरतों में खुलकर हाथ बंटाना मुश्किल था। आठ साल बाद तस्वीर बदली हुई है। ग्राम फतेहपुर की खुशबू तिवारी आज एक कैफे संभाल रही हैं, खुद ₹20 से 25 हजार प्रतिमाह तक कमा रही हैं और उनके काम से करीब 25 लोगों को रोजगार भी मिला है।
खुशबू के जीवन में इस बदलाव की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई, जब वे स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। मध्यप्रदेश डे-राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से आगे बढ़ने का अवसर मिला और बाद में पं. शिवनाथ शास्त्री शासकीय स्वशासी आयुर्वेद कॉलेज एवं चिकित्सालय में ‘शुभम आजीविका स्वाद संगम रेस्टोरेंट कैफे’ के संचालन की जिम्मेदारी मिली।
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खुद लगाए ₹2 लाख, समूह से मिले ₹3 लाख; यहीं से बदली कमाई की तस्वीर
कैफे को आगे बढ़ाने के लिए खुशबू ने करीब ₹2 लाख अपनी ओर से निवेश किए, जबकि उनके मुताबिक समूह से लगभग ₹3 लाख की सहायता मिली। यानी करीब ₹5 लाख की पूंजी के साथ काम को विस्तार मिला।
खुशबू बताती हैं कि समूह से जुड़ने से पहले उनकी मासिक आय करीब ₹8 से 10 हजार थी। अब कैफे के संचालन से यह बढ़कर करीब ₹20 से 25 हजार प्रतिमाह हो गई है। यानी अधिकतम मासिक आय के आधार पर देखें तो कमाई करीब ढाई गुना तक पहुंची है।
रोज 300 लोगों की थाली की जिम्मेदारी
कैफे का दायरा केवल खुशबू की व्यक्तिगत कमाई तक सीमित नहीं है। यहां प्रतिदिन आयुर्वेद कॉलेज के करीब 300 छात्र-छात्राओं और स्टाफ के लिए निर्धारित मेनू के अनुसार भोजन तैयार किया जाता है। संचालन में समूह की महिलाओं और अन्य लोगों का सहयोग लिया जा रहा है। खुशबू के अनुसार इससे करीब 25 लोगों को रोजगार मिला है।
पहले खुद जरूरतमंद थीं, अब दूसरों के लिए भी रोजगार का जरिया
खुशबू बताती हैं कि पहले कम आमदनी के कारण आर्थिक जरूरतों के लिए परिवार पर निर्भर रहना पड़ता था। अब वे अपनी कमाई से परिवार की जरूरतों में सहयोग कर रही हैं। आय बढ़ने के साथ व्यवसाय संभालने का आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
एक महिला का स्व-सहायता समूह से जुड़ना केवल उसकी आमदनी बढ़ने तक सीमित नहीं रहा। आठ साल में खुशबू ने खुद आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया और अपने काम के जरिए दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का माध्यम बनीं। अब उनकी योजना कैफे और व्यवसाय को आगे बढ़ाने की है। मध्यप्रदेश डे-राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामीण महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोड़कर स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। खुशबू की कहानी इसी पहल के जरिए विकसित हुए आजीविका मॉडल का एक स्थानीय उदाहरण है।



