बुरहानपुर। सरकार एक ओर करोड़ों-अरबों रुपये की जनकल्याणकारी योजनाओं का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी ओर हकीकत यह है कि जन्म से दिव्यांग एक आदिवासी दंपत्ति अपने चार मासूम बच्चों के साथ भीख मांगकर जीवन यापन करने को मजबूर है। यह तस्वीर बुरहानपुर जिले के नेपानगर क्षेत्र के ग्राम बाकड़ी की है, जिसने प्रशासनिक संवेदनहीनता और सिस्टम की नाकामी को बेनकाब कर दिया है।
न देख पाने वाला पति, चल न सकने वाली पत्नी
ग्राम बाकड़ी निवासी शारदा दोनों पैरों से दिव्यांग है, जबकि उसके पति तेलु दोनों आंखों से देख नहीं पाते। परिवार में चार बेटियां हैं। हालात इतने बदतर हैं कि रोज़मर्रा का पेट भरने के लिए दंपत्ति को भीख का सहारा लेना पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब सरकार दिव्यांगों के लिए विशेष योजनाएं चला रही है, तो यह परिवार उनसे कोसों दूर क्यों है?
योजनाएं हैं, लेकिन लाभार्थी नहीं
शारदा को महज 600 रुपये दिव्यांग पेंशन मिल रही है, जबकि लाड़ली बहना योजना का लाभ आज तक नहीं मिला। यदि यह योजना मिलती, तो उसे 1500 रुपये प्रतिमाह का सहारा होता। वहीं पति तेलु को किसी भी प्रकार की पेंशन नहीं, न प्रधानमंत्री आवास, न ही बच्चों को लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ मिला।
कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचे, पर मदद नहीं मिली
न्याय की आस में दिव्यांग दंपत्ति कलेक्टर कार्यालय पहुंचे, लेकिन यहां भी सिस्टम ने साथ नहीं दिया। ई-केवाईसी न होने का हवाला देकर उन्हें बेरंग लौटा दिया गया। हैरानी की बात यह रही कि कलेक्टर कार्यालय से लेकर हाईवे तक व्हीलचेयर तक उपलब्ध नहीं कराई गई। दोनों दिव्यांग माता-पिता अपनी दो मासूम बेटियों के सहारे हाईवे तक पहुंचे—यह दृश्य प्रशासन पर करारा तमाचा है।
विधायक आदिवासी, फिर भी आदिवासी वंचित क्यों?
नेपानगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक स्वयं आदिवासी हैं। हाल ही में बजट और योजनाओं को लेकर भव्य पत्रकार वार्ताएं हुईं, मंचों से विकास और कल्याण के बड़े-बड़े दावे किए गए। लेकिन जब एक जन्म से दिव्यांग आदिवासी दंपत्ति हकीकत में मदद मांगने पहुंचा, तो सारे दावे खोखले साबित हो गए।
विभाग का जवाब या जिम्मेदारी से पल्ला?
जब इस मामले में सामाजिक न्याय विभाग के उपसंचालक दुर्गेश कुमार दुबे से बात की गई, तो उन्होंने कहा दंपत्ति की ई-केवाईसी नहीं हुई है, शिविर लगाए जाते हैं लेकिन ये लोग आ नहीं पाते। सवाल यह है कि जो चल नहीं सकता, देख नहीं सकता, वह शिविर तक कैसे पहुंचे? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसे मामलों में घर तक पहुंचकर मदद करे?
बड़े सवाल, जिनका जवाब चाहिए
- क्या जनकल्याणकारी योजनाएं सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित हैं?
- दिव्यांगों की ई-केवाईसी के लिए घर-घर व्यवस्था क्यों नहीं?
- कलेक्टर कार्यालय में दिव्यांगों के लिए बुनियादी सुविधाएं क्यों नदारद?
- आखिर कब तक सिस्टम की खामियों की सजा मासूम बच्चे भुगतेंगे?
यह मामला सिर्फ एक दंपत्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है। अगर अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो “सबका साथ, सबका विकास” सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा।