Homeबुरहानपुर7 दिन राशन पर ‘ब्रेक’: महीने की...

7 दिन राशन पर ‘ब्रेक’: महीने की पहली तारीख से सेल्समैन हड़ताल पर, गरीबों को करना पड़ेगा इंतजार

जिले की पीडीएस दुकानों के विक्रेताओं ने बंद किया काम; बोले—10 साल से मांगें लंबित, समय पर कमीशन तक नहीं मिलता

बुरहानपुर। महीने की पहली तारीख…यानी वह समय जब हजारों जरूरतमंद परिवार सरकारी उचित मूल्य दुकानों पर गेहूं-चावल सहित अपना राशन लेने पहुंचते हैं। लेकिन इस बार अक्टूबर की शुरुआत राशन वितरण के बजाय हड़ताल से हुई है। जिले की पीडीएस दुकानों के सेल्समैन अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर 1 अक्टूबर से सात दिन की हड़ताल पर चले गए हैं। ऐसे में हड़ताल जारी रहने तक राशन वितरण प्रभावित होने और हितग्राहियों को इंतजार करने की स्थिति बन गई है।

Sadaiv News
बुरहानपुर में सात दिवसीय हड़ताल पर PDS राशन दुकान विक्रेता

सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को हो सकती है, जिनके घर का खाद्यान्न काफी हद तक सरकारी राशन पर निर्भर है। सरकार की योजना के तहत मिलने वाला गेहूं, चावल और अन्य सामग्री दुकान से नहीं मिलने पर जरूरतमंद परिवारों को या तो वितरण शुरू होने का इंतजार करना होगा या जरूरत पड़ने पर बाजार से खाद्यान्न खरीदना पड़ेगा। प्रदेश स्तरीय आंदोलन के तहत गुरुवार को राशन विक्रेता कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और अपनी मांगों को लेकर अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। विक्रेताओं का कहना है कि उनकी समस्याएं नई नहीं हैं। कई मांगें वर्षों से उठाई जा रही हैं, लेकिन समाधान नहीं होने के कारण अब सात दिन काम बंद करने का निर्णय लिया गया है।

विक्रेता बोले—महंगाई बढ़ती गई, कमीशन से दुकान चलाना मुश्किल

राशन विक्रेताओं का कहना है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन पीडीएस दुकान संचालन से मिलने वाला कमीशन पर्याप्त नहीं है। दुकान का खर्च निकालने और परिवार का भरण-पोषण करने में आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सेल्समैन शोएब अहमद ने कहा कि प्रदेश की करीब 28 हजार शासकीय उचित मूल्य दुकानों के सेल्समैन की मांगें करीब 10 साल से लंबित हैं। विक्रेताओं की मांग है कि कमीशन बढ़ाकर ₹200 प्रति क्विंटल किया जाए और भुगतान भी समय पर हो। विक्रेताओं का कहना है कि महीने का वितरण समाप्त होने के बाद भी कमीशन के लिए इंतजार करना पड़ता है। उनकी मांग है कि हर महीने की पांच तारीख तक कमीशन का भुगतान अनिवार्य रूप से कर दिया जाए।

राशन में ‘घट’ भी बड़ा मुद्दा, विक्रेता मांग रहे प्रति क्विंटल 5 किलो की भरपाई

आंदोलन में खाद्यान्न की शॉर्टेज को भी प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। विक्रेताओं का दावा है कि उन्हें मिलने वाले खाद्यान्न में प्रति क्विंटल एक से पांच किलो तक की कमी सामने आती है। इसका भार आखिरकार दुकान संचालक पर आता है। इसी कारण उनकी मांग है कि सरकार प्रति क्विंटल 5 किलो शॉर्टेज की क्षतिपूर्ति का स्पष्ट प्रावधान करे। विक्रेताओं के मुताबिक परिवहन, हैंडलिंग और वितरण की पूरी प्रक्रिया में होने वाली घट का आर्थिक नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है। उनका कहना है कि जब वितरण का पूरा हिसाब पीओएस मशीन के जरिए लिया जाता है तो वास्तविक शॉर्टेज की समस्या का भी समाधान होना चाहिए।

पहले ₹10,500 मानदेय, अब ₹8,500 मिलने का दावा; मांग ₹18 हजार की

सेल्समैन शैला सूर्यवंशी ने कहा कि वे स्व-सहायता समूह चलाने के साथ कंट्रोल दुकान का भी संचालन करती हैं। उनके अनुसार पहले ₹10,500 मानदेय मिलता था, जबकि अब ₹8,500 मिल रहा है। उन्होंने इसे बढ़ाकर ₹18 हजार करने की मांग की है। सूर्यवंशी ने कहा कि एक क्विंटल खाद्यान्न में एक से पांच किलो तक घट सामने आती है, इसलिए पांच किलो शॉर्टेज का प्रावधान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि फिलहाल आंदोलन सात दिन के लिए है। इसके बाद प्रदेश स्तर पर जो निर्णय होगा, उसी के अनुसार आगे की रणनीति तय की जाएगी।

₹40 हजार न्यूनतम आय की गारंटी भी मांगी

विक्रेताओं की मांग केवल कमीशन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित राशन दुकानों के लिए ₹40 हजार न्यूनतम मासिक आय निर्धारित करने की मांग भी रखी है। विक्रेताओं का तर्क है कि प्रत्येक दुकान पर हितग्राहियों और खाद्यान्न आवंटन की मात्रा अलग-अलग होने के कारण केवल प्रति क्विंटल कमीशन पर निर्भर रहने से सभी दुकानों की आय समान नहीं हो सकती। इसलिए आर्थिक सुरक्षा के लिए न्यूनतम आय की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने सेवा सहकारी समितियों और वन समितियों को भी निर्देश देने की मांग की है कि उनके अधीन काम करने वाले राशन विक्रेताओं को मिलने वाली राशि समय पर दी जाए।

पीओएस से वितरण, फिर भी आर्थिक संकट का दावा

सरकारी राशन वितरण व्यवस्था अब पीओएस मशीन आधारित है। विक्रेताओं का कहना है कि पीओएस मशीन से वितरण करने पर केंद्र की ओर से दी जाने वाली ₹21 प्रति क्विंटल अतिरिक्त राशि का मुद्दा भी उनकी मांगों में शामिल है। जिले में शासकीय उचित मूल्य दुकानों का संचालन स्व-सहायता समूह, सेवा सहकारी समिति, उपभोक्ता भंडार, बहुउद्देशीय संस्था और वनोपज समितियों सहित अलग-अलग संस्थाओं के माध्यम से किया जाता है। विक्रेताओं का कहना है कि व्यवस्था कोई भी हो, दुकान चलाने वाले व्यक्ति की आर्थिक सुरक्षा और समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

महीने की शुरुआत में हड़ताल, इसलिए असर ज्यादा

हड़ताल का समय भी महत्वपूर्ण है। पीडीएस दुकानों पर महीने की शुरुआत से ही हितग्राहियों का राशन लेने पहुंचना शुरू हो जाता है। ठीक इसी समय 1 अक्टूबर से विक्रेताओं ने काम बंद किया है। इससे सात दिन तक वितरण प्रभावित रहा तो उन परिवारों की परेशानी बढ़ सकती है, जो महीनेभर के खाद्यान्न के लिए पीडीएस पर निर्भर हैं। सरकार की योजना के तहत पात्र परिवारों को मिलने वाला राशन निःशुल्क है, लेकिन दुकान से वितरण नहीं होने की स्थिति में तत्काल जरूरत वाले परिवारों को बाजार से गेहूं-चावल खरीदना पड़ सकता है। इससे उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

10 साल से मांगें लंबित होने का दावा, अब आंदोलन बढ़ाने की चेतावनी

विक्रेताओं ने साफ किया है कि यह आंदोलन सात दिन में समाप्त होगा या आगे बढ़ेगा, इसका निर्णय प्रदेश स्तर पर लिया जाएगा। यदि मांगों पर समाधान नहीं निकलता है तो आंदोलन को और बड़ा करने की चेतावनी भी दी गई है। यानी मामला केवल सात दिन की हड़ताल तक सीमित रहेगा, इसकी अभी गारंटी नहीं है।

ये हैं विक्रेताओं की प्रमुख मांगें

  • कमीशन बढ़ाकर ₹200 प्रति क्विंटल किया जाए।
  • राशन विक्रेताओं की न्यूनतम मासिक आय ₹40 हजार निर्धारित की जाए।
  • खाद्यान्न में प्रति क्विंटल 5 किलो शॉर्टेज की क्षतिपूर्ति का प्रावधान हो।
  • हर महीने की 5 तारीख तक कमीशन का भुगतान किया जाए।
  • स्व-सहायता समूह से जुड़े विक्रेताओं का मानदेय बढ़ाया जाए।
  • सेवा सहकारी समितियों और वन समितियों के अधीन कार्यरत विक्रेताओं को समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
  • पीओएस मशीन से वितरण पर मिलने वाली अतिरिक्त राशि का लाभ नियमानुसार दिया जाए।

सवाल गरीब परिवारों का—हड़ताल लंबी चली तो राशन कब मिलेगा?

राशन विक्रेताओं की अपनी आर्थिक मांगें हैं, लेकिन हड़ताल का सीधा असर आखिरकार पीडीएस हितग्राहियों पर पड़ने की आशंका है। जिन परिवारों को बाजार से खाद्यान्न खरीदने के बजाय सरकारी दुकान से मिलने वाले राशन का इंतजार रहता है, उनके लिए सात दिन भी महत्वपूर्ण हैं। अब निगाह प्रशासन और सरकार के अगले कदम पर है। सात दिन के भीतर मांगों पर कोई रास्ता निकलता है या राशन विक्रेता आंदोलन को आगे बढ़ाते हैं—इसी पर निर्भर करेगा कि पीडीएस व्यवस्था कितने दिन प्रभावित रहती है।

spot_img
spot_img
spot_img

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img
- Advertisement -spot_img
- Advertisement -spot_img

Latest Articles