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200 साल पुरानी परंपरा फिर जीवंत: देवकर परिवार ने मां अंबा का आगमन ‘पगघड़ी परंपरा’ से कराया

गरबे से पहले मां अंबा का स्वागत, पगघड़ी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

बुरहानपुर। शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही बुरहानपुर में भक्ति और उल्लास का माहौल छा गया है। शहर में एक ओर जहां गरबे और मां दुर्गा की भव्य आराधना हो रही है, वहीं दूसरी ओर देवकर परिवार ने सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत कर दिखाया। इस वर्ष परिवार के लोकेश देवकर और सारिका देवकर ने मां अंबा का स्वागत अनोखी ‘पगघड़ी परंपरा’ से किया।

मान्यता है कि मां अंबा के चरण कहीं और न पड़ें, इसलिए भक्त उन्हें पलकों पर बैठाकर पगघड़ी पर चादर बिछाकर घर में लाते हैं। यही कारण है कि इसे ‘पगघड़ी परंपरा’ कहा जाता है। माना जाता है कि जब मां अंबा इस विधि से घर में प्रवेश करती हैं तो भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उनके जीवन से संकट दूर हो जाते हैं।

200 साल पुरानी परंपरा को किया जीवंत

देवकर परिवार का कहना है कि यह परंपरा करीब 200 साल पुरानी है, जिसे उनके पूर्वज निभाते आए हैं। परिवार के बुजुर्ग भारत भूषण देवकर और मीना देवकर बताते हैं,  जब-जब हमने मां का आगमन कराया है, तब-तब घर में शुभ कार्य हुए और हर बार मां ने हमारी मनोकामनाएं पूरी की हैं।

15 से 20 दिन तक होती है मां की आराधना

लोकेश और सारिका देवकर ने इस बार मां अंबा को पगघड़ी से घर में लाने का निर्णय लिया। अब 15 से 20 दिनों तक मां की पूजा, आराधना और गरबे का आयोजन किया जाएगा। परिवार के लोग मानते हैं कि मां अंबा को गरबा लाकर बिठाने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

पिछली बार गोपाल और अनीता देवकर ने निभाई थी परंपरा

पिछले वर्ष यही परंपरा गोपाल देवकर और अनीता देवकर ने निभाई थी। अनीता देवकर बताती हैं, पिछले 30 सालों में मैंने करीब 10 से 12 बार मां अंबा को गरबे के साथ घर में लाया है। जब-जब मां से विनती की, मां ने हर बार मेरी मनोकामनाएं पूरी की हैं।

नए घर में भी मां का पहला प्रवेश

इस वर्ष परिवार के शरद देवकर और वनीता देवकर ने अपने नए घर में प्रवेश से पहले मां अंबा का आगमन कराया। उनका कहना है कि यदि नए निवास में मां का वास हो जाए तो घर में किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आती। बुरहानपुर में शारदीय नवरात्र का यह दृश्य सिर्फ आस्था ही नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरा को भी मजबूत करता है। देवकर परिवार का यह अनूठा आयोजन समाज के लिए प्रेरणा है कि आस्था और विश्वास जब परंपरा के साथ जुड़ते हैं तो वह भक्ति का जीवंत उदाहरण बन जाते हैं।

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