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उतावली नदी में अर्ध जलमग्न होकर पांगरी बांध प्रभावितों का अनोखा विरोध —सरकार को चेताया: हक छीनने नहीं देंगे

न्यायसंगत मुआवजे की मांग पर किसानों का गुस्सा फूटा

बुरहानपुर/खकनार। पांगरी बांध परियोजना से प्रभावित किसानों ने रविवार को उतावली नदी में अर्ध जलमग्न होकर सरकार के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। शांतिपूर्ण तरीके से किए गए इस अनोखे आंदोलन में किसानों ने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून के तहत उचित और न्यायसंगत मुआवजा मिलना उनका अधिकार है, और इस अधिकार के साथ किसी भी तरह की नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हमारे मौलिक अधिकारों पर हमला… गरीब और आदिवासी किसानों का शोषण बंद करो आंदोलनकारियों ने स्पष्ट आरोप लगाया कि सरकार भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में गरीब और आदिवासी किसानों को दबाने की कोशिश कर रही है।

यदि एक गुना मुआवजा दिया जाए, तो वह शहरी दरों पर आधारित होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र होने की स्थिति में कानून के अनुसार दोगुना मुआवजा दिया जाए। परियोजना शुरू करने से पहले अनिवार्य पर्यावरण प्रभाव आकलन कराया जाए। किसानों का कहना है कि पिछले तीन वर्षों से लगातार ज्ञापन, निवेदन और विरोध के बावजूद शासन-प्रशासन ने उनकी मांगों को अनसुना किया है।

287 हेक्टेयर भूमि डूबेगी, 1,500 किसान सीधी चपेट में

खकनार तहसील के पांगरी, नागझिरी और बसाली गांवों की लगभग 287 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन इस बांध से जलमग्न हो जाएगी। इससे लगभग डेढ़ हजार किसान सीधे प्रभावित होंगे। पांगरी बांध बुरहानपुर जिले की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में शामिल है, जिससे लगभग 4,400 हेक्टेयर भूमि सिंचित होने का अनुमान है। किसानों का कहना है कि सिंचाई क्षेत्र बढ़ाने की कीमत पर हजारों परिवारों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।

औने-पौने दामों पर जमीन खरीद

डॉ. रवि कुमार पटेल ने कहा कि जिले में बड़े पैमाने पर किसानों की जमीनें कम कीमत पर खरीदकर परियोजना को आगे बढ़ाया गया, जो न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि गरीब किसानों के जीवन पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा जिले में पहली बार ऐसा हो रहा है कि सरकारी परियोजना के नाम पर आदिवासी किसानों को मजबूर कर औने-पौने दामों में जमीन लेकर विकास का नाम दिया जा रहा है।

संवेदनशील पेड़ों और औषधीय प्रजातियों पर मंडराता संकट

बांध के डूब क्षेत्र में आने से कई पारंपरिक औषधीय और संरक्षित प्रजातियाँ नष्ट हो जाएंगी। इनमें शामिल हैं- मदनफल, शिवलिंगी, बला, नागबला, अर्जुन, शीशम, अपामार्ग, हरड़, बहेड़ा। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इन पेड़ों के संरक्षण के लिए न तो सर्वे किया गया और न ही किसी सहायता योजना की घोषणा।

किसानों की बड़ी उपस्थिति—एकजुट होकर दिया संदेश

अर्ध जलमग्न आंदोलन में बड़ी संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया, जिनमें नंदू पटेल, मान्या भिलावेकर, रामदास महाराज, माधो नाटो, बद्री वास्कले, श्रीराम, सालिकराम, श्रीकिसन, नीतीश श्रॉफ, संजय चौकसे, मामराज, राजूभाई, नवल, राहुल राठौड़, डॉ. ओमप्रकाश राठौड़, देवा, विजय, पन्ना पटेल, रुपला सहित आसपास गांवों के किसान भी आंदोलन स्थल पर उपस्थित रहे।

हम लड़ेंगे—रुकेंगे नहीं

किसानों ने चेतावनी दी है कि जब तक उन्हें भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार पूरा और सही मुआवजा नहीं मिल जाता, तब तक यह आंदोलन और तेज किया जाएगा। किसानों का कहना है कि सरकार के पास विकास का अधिकार है, लेकिन किसानों के जीवन और जमीन का सौदा नहीं किया जा सकता।

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