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जबलपुर हाईकोर्ट ने 2016 से लगा रखा है प्रदेश में बैन, फिर भी खुलकर हुआ आयोजन
बुरहानपुर। दीपावली के दूसरे दिन शाहपुर में वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। अमरावती नदी किनारे एक बार फिर पाड़ों की सींगें भिड़ीं, भीड़ ने हूटिंग की, और परंपरा के नाम पर कानून की साफ-साफ अवहेलना हो गई। नतीजा, अब मेला समिति के 5 सदस्यों पर एफआईआर दर्ज हुई है।
दरअसल शाहपुर पुलिस ने तहसीलदार-कार्यपालिक दंडाधिकारी के 22 अक्टूबर को जारी आदेश के उल्लंघन के आरोप में मेला आयोजन समिति के 5 प्रमुख सदस्यों पर केस दर्ज किया है। एफआईआर में शामिल नाम वासुदेव महाजन (32, वार्ड क्रमांक 07, शाहपुर), सुनील वानखेड़े, पंकज राऊत, शेख अनवर, अर्जुन चौधरी इन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 125 और 3-5, तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1)(घ) के तहत मामला दर्ज हुआ है।
50 से ज्यादा जोड़ी पाड़ों की भिड़ंत, 50 हजार की भीड़
हर साल की तरह इस बार भी दीपावली के पड़वा पर अमरावती नदी किनारे शाहपुर-फोपनार रोड पर मेला लगा। करीब 50 जोड़ी पाड़ों के बीच मुकाबले हुए सींग से सींग भिड़ी, कुछ घायल हुए, कुछ थककर बैठ गए। मेला मैदान में करीब 50 हजार दर्शक जुटे। लोग न सिर्फ बुरहानपुर और खंडवा से बल्कि महाराष्ट्र के रावेर, जलगांव, अकोला तक से पहुंचे।
परंपरा बनाम प्रशासन
स्थानीय लोगों का कहना है ये हमारा सालों पुराना मेला है, गोवर्धन पूजा के दिन पाड़ों की टक्कर के बिना त्योहार अधूरा लगता है। लेकिन प्रशासन का तर्क साफ है जबलपुर उच्च न्यायालय ने 2016 में ऐसे आयोजनों पर प्रदेशभर में प्रतिबंध लगाया था। आदेश का पालन न करना कानून का उल्लंघन है।
जबलपुर हाईकोर्ट का आदेश: 2016 से बैन
जबलपुर उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका (WP No. 1839/2016) में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. खानविलकर एवं न्यायाधीश संजय यादव की डबल बेंच ने 29 जनवरी 2016 को आदेश जारी कर पूरे मध्यप्रदेश में पाड़ों की टक्कर और छकड़ा रेस जैसे आयोजनों पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने इन्हें पशु क्रूरता के दायरे में लाते हुए कहा था कि ऐसे आयोजनों में पशुओं के साथ अमानवीय व्यवहार होता है। इसके बावजूद शाहपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा आज भी जारी है।
क्या यह कोर्ट की अवमानना है?
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर हाईकोर्ट का आदेश आज भी प्रभावी है और फिर भी आयोजन हुआ, तो यह सीधी न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की श्रेणी में आता है। एफआईआर दर्ज होना पर्याप्त नहीं, प्रशासन को ऐसे आयोजनों को रोकने की जिम्मेदारी भी उठानी होगी।
ग्रामीणों का तर्क – परंपरा से छेड़छाड़ नहीं
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि यह मेला सदियों पुरानी परंपरा है, जो भगवान श्रीकृष्ण के गोवर्धन पर्व से जुड़ी है। पाड़ों की टक्कर को ‘शौर्य और शक्ति का प्रतीक’ माना जाता है। लोग इसे त्यागने को तैयार नहीं हैं।
प्रशासन सख्त, आगे और कार्रवाई संभव
एफआईआर के बाद पुलिस ने आयोजन स्थल का वीडियो फुटेज, ड्रोन् और मीडिया क्लिपिंग संकलित की गई हैं। सूत्रों के अनुसार, संबंधित तहसीलदार ने रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेज दी है। अगले चरण में आयोजकों पर पशु क्रूरता अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई और कोर्ट में रिपोर्ट पेश की जा सकती है।