बुरहानपुर। शहर के दो प्रमुख व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर चार दिनों तक चली जीएसटी सर्वे की कार्रवाई सोमवार को औपचारिक रूप से समाप्त हो गई, लेकिन कार्रवाई के बाद भी जीएसटी विभाग के अफसर न तो दस्तावेजों की वास्तविकता बता पाए और न ही कर अपवंचन की कोई ठोस जानकारी सामने रख सके। चार दिन तक चली इस हाई-प्रोफाइल कार्रवाई का नतीजा अब तक रहस्य बना हुआ है।
दरअसल जीएसटी सर्वे की कार्रवाई शुक्रवार शाम को कमल चौक क्षेत्र स्थित गोविंद दास सराफ ज्वेलर्स प्रायवेट लिमिटेड और लालबाग रोड स्थित बादशाह स्टील्स हार्डवेयर (हजरत गोटिया पीर दरगाह के पास) पर शुरू हुई थी। यह कार्रवाई इंदौर से आई विशेष जीएसटी टीम द्वारा की गई, जो सोमवार सुबह तक चली। टीम ने चार दिनों तक दोनों प्रतिष्ठानों में स्टॉक, खरीद-बिक्री के बिल, रजिस्टर, कंप्यूटर डाटा और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की गहन जांच की, लेकिन इसके बाद भी विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया।
सूत्रों के अनुसार एक प्रतिष्ठान पर सर्वे रविवार रात को ही पूरा कर लिया गया था, जबकि दूसरे प्रतिष्ठान पर सोमवार को कार्रवाई समाप्त हुई। इसके बाद टीम के कुछ अधिकारी इंदौर रवाना भी हो गए, लेकिन जाते-जाते भी वे यह स्पष्ट नहीं कर सके कि जांच में क्या सामने आया।
स्थानीय जीएसटी अफसर भी रखे गए दूर
इस पूरे सर्वे की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि स्थानीय वाणिज्यिक कर विभाग के अधिकारियों को भी कार्रवाई से पूरी तरह दूर रखा गया। चार दिन तक चली जांच के दौरान स्थानीय अफसर केवल दर्शक बने रहे। इससे विभागीय पारदर्शिता और समन्वय पर सवाल उठने लगे हैं। चार दिनों तक दोनों प्रतिष्ठानों पर लोगों के आने-जाने पर सख्त पाबंदी रही। बाहर सुरक्षा व्यवस्था रही और भीतर दस्तावेजों की जांच चलती रही। कार्रवाई की गंभीरता को देखते हुए पूरे शहर में माहौल तनावपूर्ण बना रहा।
व्यापारियों में मचा हड़कंप, दुकानें तक रहीं बंद
चार दिन तक चली जीएसटी कार्रवाई से शहर के व्यापारिक जगत में हड़कंप मच गया। कई व्यापारियों ने आशंका के चलते अपनी दुकानें तक नहीं खोलीं। हर जगह यही चर्चा रही कि “अब किसका नंबर है?” लेकिन कार्रवाई खत्म होने के बाद भी विभाग की चुप्पी ने संदेह और बढ़ा दिया।
स्थानीय विभाग की निष्क्रियता भी कटघरे में
व्यापारी संगठनों का कहना है कि स्थानीय जीएसटी विभाग सालभर में एक-दो कार्रवाई से आगे नहीं बढ़ता। यही वजह है कि इस बार बाहर से टीम बुलानी पड़ी। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी होती, तो इतनी बड़ी कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ती?
चार दिन की रेड, लेकिन जवाब शून्य
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दस्तावेजों में गड़बड़ी मिली या सब कुछ सही पाया गया? यदि कर अपवंचन था तो राशि कितनी है? आगे जुर्माना, नोटिस या एफआईआर जैसी कोई कार्रवाई होगी या नहीं? या फिर यह कार्रवाई भी फाइलों में दफन हो जाएगी? चार दिन की लंबी और गोपनीय कार्रवाई के बाद भी अफसरों का जवाब न देना न केवल संदेह पैदा करता है, बल्कि जीएसटी विभाग की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। अब शहर को इंतजार है—सच सामने आएगा या नहीं?