बुरहानपुर। जिला अस्पताल के बहुचर्चित खरीदी प्रकरण में आखिरकार भोपाल से बड़ा प्रशासनिक एक्शन सामने आ गया है। खंडवा लोकसभा सांसद ज्ञानेश्वर पाटील द्वारा जिला अस्पताल के निरीक्षण के दौरान सामग्री की गुणवत्ता और खरीदी प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों के बाद नेपानगर विधायक मंजू राजेंद्र दादू की लिखित शिकायत ने पूरे मामले को भोपाल तक पहुंचा दिया। अब संचालनालय लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, मध्यप्रदेश ने प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.के. वर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिन में अभिलेखों सहित जवाब तलब किया है।
यह मामला सिर्फ एक सामान्य खरीदी विवाद नहीं माना जा रहा है, बल्कि जिला अस्पताल में बने लगभग 18 करोड़ रुपए के क्रिटिकल केयर सेंटर से जुड़ी सामग्री और उपकरणों की खरीदी पर उठे सवालों से संबंधित है। आरोप है कि खरीदी प्रक्रिया में न तो गुणवत्ता को लेकर पर्याप्त सतर्कता बरती गई और न ही तकनीकी व वित्तीय प्रक्रिया को उस गंभीरता से अपनाया गया, जिसकी अपेक्षा सरकारी खरीदी में की जाती है।
निरीक्षण में सवाल उठे, शिकायत भोपाल पहुंची और नोटिस जारी हो गया
मामले की शुरुआत जिला अस्पताल के निरीक्षण के दौरान सामने आई आपत्तियों से हुई। सांसद ज्ञानेश्वर पाटील ने अस्पताल में उपलब्ध कराई गई सामग्री और खरीदी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे। इसके बाद नेपानगर विधायक मंजू दादू ने लिखित शिकायत कर पूरे मामले को विभागीय स्तर पर गंभीरता से उठाया। शिकायत में सामग्री की गुणवत्ता, मूल्यांकन, खरीदी प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए गए थे। शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने मामले को जांच के दायरे में लिया। क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं, इंदौर संभाग की जांच रिपोर्ट के परीक्षण के बाद संचालनालय लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, भोपाल ने प्रभारी सीएमएचओ डॉ. आर.के. वर्मा को नोटिस जारी किया। नोटिस जारी होते ही स्वास्थ्य विभाग के प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
26.72 लाख की सामग्री पर गंभीर सवाल
प्रकरण में लगभग 26.72 लाख रुपए की सामग्री की गुणवत्ता और प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। शिकायत में यह बात सामने आई कि खरीदी गई सामग्री के स्तर, बाजार मूल्य, उपयोगिता और गुणवत्ता को लेकर आपत्तियां थीं। सवाल यह भी है कि यदि सामग्री मानक के अनुरूप थी, तो बाद में उसे बदलने की नौबत क्यों आई? यही बिंदु पूरे मामले को और गंभीर बनाता है। क्योंकि जब किसी सरकारी अस्पताल के क्रिटिकल केयर सेंटर के लिए उपकरण और फर्नीचर खरीदे जाते हैं, तो उनसे सीधे मरीजों की सुविधा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता जुड़ी होती है। ऐसे में यदि खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता या गुणवत्ता परीक्षण को लेकर सवाल उठते हैं, तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे से जुड़ा मामला बन जाता है।
नोटिस में खरीदी प्रक्रिया की पोल खोलने वाले बिंदु
संचालनालय द्वारा जारी नोटिस में कई गंभीर कमियों का उल्लेख किया गया है। नोटिस के अनुसार खरीदी से पहले उपकरण और फर्नीचर के स्पष्ट तकनीकी स्पेसिफिकेशन का पूर्व निर्धारण नहीं किया गया। यानी किस स्तर की सामग्री खरीदी जानी थी, उसकी तकनीकी शर्तें पहले से स्पष्ट और व्यवस्थित रूप से तय नहीं की गईं। नोटिस में यह भी कहा गया कि क्रय प्रक्रिया से पहले आवश्यक निविदा शर्तों को सक्षम क्रय समिति और जिला क्रय समिति से अनुमोदित नहीं कराया गया। इससे खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होने की बात सामने आई है। इतना ही नहीं, तकनीकी निविदा और वित्तीय निविदा से जुड़े जरूरी दस्तावेज, तुलनात्मक विवरण, मूल्यांकन समिति की कार्यवाही और अन्य रिकॉर्ड के संधारण में भी गंभीर कमी बताई गई है। सरकारी खरीदी में यही दस्तावेज यह साबित करते हैं कि प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के अनुसार हुई है। ऐसे में रिकॉर्ड की कमी अपने आप में बड़ा सवाल बन गई है।
गुणवत्ता परीक्षण बिना सामग्री स्वीकार, बाद में बदलवानी पड़ी
नोटिस का सबसे गंभीर पहलू सामग्री की गुणवत्ता से जुड़ा है। संचालनालय ने उल्लेख किया है कि खरीदी गई सामग्री और उपकरणों को नियमानुसार गुणवत्ता परीक्षण सुनिश्चित किए बिना स्वीकार कर लिया गया। बाद में जब गुणवत्ता को लेकर आपत्तियां आईं, तो जिला स्तर पर पुनः परीक्षण कर सामग्री बदलवाई गई। यही स्थिति कई सवाल खड़े करती है। यदि सामग्री सही थी, तो शिकायत के बाद बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि सामग्री बदलनी पड़ी, तो शुरुआत में उसे स्वीकार किस आधार पर किया गया? क्या गुणवत्ता जांच सिर्फ कागजों तक सीमित थी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने मौके पर सामग्री की जांच की थी? ऐसे कई सवाल अब विभागीय जांच और जवाब में स्पष्ट होने हैं।
क्रय समिति की वैधानिकता पर भी सवाल
नोटिस में यह भी उल्लेख है कि जांच के दौरान क्रय समिति के एक नामित सदस्य के हस्ताक्षर संबंधित नोटशीट पर उपलब्ध नहीं पाए गए। इससे समिति की कार्यवाही की वैधानिकता पर सवाल उठे हैं। सरकारी खरीदी में समिति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि समिति ही प्रक्रिया की पारदर्शिता, मूल्यांकन और अनुमोदन की जिम्मेदारी निभाती है। यदि समिति की कार्यवाही में ही दस्तावेजी कमी मिलती है, तो पूरा निर्णय तंत्र संदेह के घेरे में आ जाता है। यही वजह है कि यह प्रकरण अब सिर्फ खराब सामग्री या अधिक कीमत का मामला नहीं रहा, बल्कि पूरी खरीदी प्रक्रिया के पालन और निगरानी का मामला बन गया है।
प्रशासनिक नियंत्रण और पर्यवेक्षण में शिथिलता
संचालनालय ने नोटिस में कहा है कि प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण पद पर रहते हुए डॉ. वर्मा द्वारा क्रय प्रक्रिया में अपेक्षित प्रशासनिक नियंत्रण, पर्यवेक्षण और सावधानी नहीं बरती गई। नोटिस में इसे नियमों के पालन में शिथिलता और प्रशासनिक लापरवाही से जोड़ा गया है। यह टिप्पणी इसलिए गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि सीएमएचओ कार्यालय जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र है। अस्पतालों की व्यवस्थाएं, खरीदी, गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी सीधे इसी व्यवस्था से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि खरीदी जैसे संवेदनशील मामले में ही नियंत्रण कमजोर पाया जाता है, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
तीन दिन में जवाब, नहीं तो एकतरफा निर्णय
संचालनालय ने डॉ. आर.के. वर्मा को नोटिस प्राप्ति के तीन दिन के भीतर क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं, इंदौर संभाग के माध्यम से जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। जवाब अभिलेखों सहित मांगा गया है। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि तय समय में जवाब प्राप्त नहीं होता या जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर एकतरफा निर्णय लिया जा सकता है।
अब निगाहें जवाब और कार्रवाई पर
भोपाल से नोटिस जारी होने के बाद अब सबकी निगाहें प्रभारी सीएमएचओ के जवाब पर टिक गई हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि खरीदी किस दर पर हुई या सामग्री कैसी थी। असली सवाल यह है कि सरकारी धन से हुई खरीदी में नियमों का पालन कितना हुआ, गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई और जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी भूमिका कितनी गंभीरता से निभाई। सांसद के निरीक्षण, विधायक की लिखित शिकायत और अब भोपाल के नोटिस के बाद यह प्रकरण बुरहानपुर स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ा प्रशासनिक इम्तिहान बन गया है। यदि जवाब संतोषजनक नहीं रहा, तो आने वाले दिनों में जिम्मेदारी तय होने के साथ विभागीय कार्रवाई की आंच और तेज हो सकती है।