बुरहानपुर। जिले के जनजातीय कार्य विभाग में राज्य शिक्षा केंद्र के आदेशों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। स्कूलों में नियमित शिक्षकों की कमी है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, लेकिन शिक्षक और कर्मचारी अब भी बीआरसी कार्यालयों, जनशिक्षा केंद्रों और दूसरे गैर-शैक्षणिक पदों पर अटैच हैं। शिक्षा विभाग ने आदेश मिलते ही अटैचमेंट समाप्त कर कर्मचारियों को मूल संस्थाओं में भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी, मगर जनजातीय विभाग 19 दिन बाद भी पत्र जारी करने की बात ही कर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य शिक्षा केंद्र ने स्पष्ट आदेश जारी कर दिया था तो जनजातीय विभाग को अलग से पत्र का इंतजार क्यों है? और जब विभाग खुद मान रहा है कि स्कूलों में नियमित शिक्षकों की कमी है, तब शिक्षकों को कार्यालयों में बनाए रखने का औचित्य क्या है?
5 जुलाई को आदेश जारी, शिक्षा विभाग ने माना; जनजातीय विभाग ने नहीं उठाया कदम
राज्य शिक्षा केंद्र के निर्देशों का हवाला देते हुए शिक्षा विभाग ने 5 जुलाई को सभी विकासखंड शिक्षा अधिकारियों और संकुल प्राचार्यों को पत्र जारी किया था। इसमें कहा गया था कि कोई भी शिक्षक या कर्मचारी किसी अन्य संस्था अथवा कार्यालय में अटैच है तो उसे तत्काल कार्यमुक्त कर मूल संस्था में उपस्थिति दिलाई जाए। शिक्षा विभाग ने आदेश का पालन करते हुए संबंधित जनशिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को मूल शालाओं में लौटने के निर्देश दे दिए। इसके विपरीत जनजातीय विभाग ने न तो अटैचमेंट समाप्त किया और न ही अब तक कोई स्पष्ट विभागीय आदेश जारी किया। नतीजा यह है कि शिक्षक स्कूलों की जगह अब भी कार्यालयों और जनशिक्षा केंद्रों में काम कर रहे हैं।
स्कूलों में शिक्षक नहीं, कार्यालयों में बीआरसी से चपरासी तक अटैच
जानकारी के अनुसार खकनार कार्यालय में राज्य शिक्षा केंद्र से जुड़े चार कर्मचारी अब भी कार्यरत हैं। इनमें एक बीआरसी, एक बीएसी, एक बाबू और एक चपरासी शामिल हैं। इसके अलावा देड़तलाई, सिरपुर, डोईफोड़िया, खकनार, तुकईथड़, नेपानगर, नावरा, भातखेड़ा और अंबाड़ा सहित विभिन्न जनशिक्षा केंद्रों पर करीब 12 जनशिक्षक अटैचमेंट पर बताए जा रहे हैं। इन कर्मचारियों और शिक्षकों की मूल शालाओं में पहले से स्टाफ की कमी है। इसके बावजूद उन्हें अध्यापन कार्य में वापस भेजने के बजाय विभागीय कार्यालयों में बनाए रखा गया है। इसका सीधा असर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्र के विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
सहायक आयुक्त का जवाब भी उलझा, पहले शिक्षकों को जिम्मेदार बताया, फिर पत्र लिखने की बात कही
मामले में जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त भरत जांचपुरे से सवाल किया गया तो उनके जवाब में भी स्पष्टता नजर नहीं आई। पहले उन्होंने कहा कि राज्य शिक्षा केंद्र के निर्देशों का शिक्षकों को स्वयं पालन करना चाहिए और अपनी मूल संस्था में जाकर ज्वाइन करना चाहिए। यदि किसी शिक्षक को जनशिक्षक या अन्य पद पर आना है तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही आना होगा।
इसके बाद उन्होंने कहा कि संबंधित शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर राज्य शिक्षा केंद्र ने लिया था, इसलिए वही अपने पत्र के माध्यम से उन्हें वापस करेगा। फिर यह भी कहा कि यदि विभाग में आदेश का पालन नहीं हो रहा है तो जनजातीय विभाग अपनी ओर से पत्र जारी कर प्रतिनियुक्ति समाप्त होने वाले शिक्षकों को कार्यमुक्त कराएगा। सवाल यह है कि जब अधिकारी खुद आदेश और प्रक्रिया से परिचित हैं तो अब तक विभागीय पत्र क्यों नहीं निकाला गया? क्या आदेश का पालन करवाना कर्मचारियों की इच्छा पर छोड़ा जा सकता है?
एक तरफ शिक्षकों की कमी का रोना, दूसरी तरफ अटैचमेंट पर चुप्पी
सहायक आयुक्त ने माना कि स्थानांतरण के कारण कई शिक्षक जिले के बाहर चले गए हैं और जनजातीय विभाग की शालाओं में नियमित शिक्षकों की कमी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग चाहता है कि अधिक से अधिक शिक्षक स्कूलों में पहुंचकर अध्यापन कराएं। लेकिन विभाग का यह दावा जमीनी स्थिति से मेल नहीं खाता। जब शिक्षकों की कमी गंभीर है तो बीआरसी, जनशिक्षक और कार्यालयीन कार्यों में अटैच शिक्षकों को तत्काल मूल शालाओं में क्यों नहीं भेजा जा रहा? विभाग की मंशा वास्तव में शिक्षकों को स्कूल भेजने की है तो कार्रवाई आदेश जारी होने के साथ ही हो जानी चाहिए थी।
आदेश का पालन कौन कराएगा?
राज्य शिक्षा केंद्र ने आदेश जारी किया, शिक्षा विभाग ने कार्रवाई कर दी, लेकिन जनजातीय विभाग में मामला जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने तक सीमित है। कभी शिक्षकों से स्वतः मूल संस्था में ज्वाइन करने की अपेक्षा की जा रही है तो कभी राज्य शिक्षा केंद्र के पत्र का इंतजार बताया जा रहा है। इस प्रशासनिक खींचतान के बीच नुकसान उन विद्यार्थियों का हो रहा है, जिनकी कक्षाओं में नियमित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। अब देखना यह है कि जनजातीय विभाग केवल पत्र जारी करने का आश्वासन देता है या वास्तव में अटैचमेंट समाप्त कर शिक्षकों को उनकी मूल शालाओं में भेजता है।
तीखे सवाल
- आदेश के 19 दिन बाद भी जनजातीय विभाग ने पत्र क्यों नहीं निकाला?
- स्कूलों में शिक्षकों की कमी के बावजूद अध्यापकों को कार्यालयों में क्यों बैठाया गया है?
- अटैचमेंट समाप्त कराने की जिम्मेदारी अधिकारियों की है या शिक्षकों की इच्छा पर छोड़ दी गई है?
- बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा?