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ग्रामीणों की चेतावनी—जल्द काम शुरू नहीं हुआ तो सड़क पर उतरकर करेंगे आंदोलन
बुरहानपुर/खकनार। देश आजादी की 79वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है, लेकिन खकनार क्षेत्र के सात से अधिक गांवों के लोगों को आज भी पक्की सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का इंतजार है। ग्राम बसाली से कुंडिया तक का मार्ग बारिश शुरू होते ही कीचड़, गड्ढों और फिसलन में तब्दील हो गया है। वर्षों से मांग और जिम्मेदारों के आश्वासन सुनते आ रहे ग्रामीणों का रविवार को सब्र टूट गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण कुंडिया फाटा पहुंचे और बदहाल मार्ग की तस्वीर दिखाते हुए शासन-प्रशासन से तत्काल पक्की सड़क बनाने की मांग की।
ग्रामीणों का आरोप है कि वे इस मार्ग के निर्माण के लिए पहले कलेक्टर और नेपानगर विधायक के सामने भी मांग रख चुके हैं, लेकिन अब तक न सड़क का प्रस्ताव धरातल पर उतरा और न आवागमन के लिए कोई ठोस वैकल्पिक व्यवस्था की गई। हर बारिश में मार्ग की स्थिति बिगड़ती है, ग्रामीण विरोध करते हैं और जिम्मेदार अधिकारी आश्वासन देकर मामला ठंडा कर देते हैं।
सात गांवों की लाइफलाइन, फिर भी विभाग बेपरवाह
बसाली-कुंडिया मार्ग बसाली, साईखेड़ा, नागझिरी, आमगांव, उसारणी और नांदुरा सहित आसपास के सात से अधिक गांवों को खकनार तहसील से जोड़ने वाला सबसे नजदीकी रास्ता है। ग्रामीणों को तहसील कार्यालय, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, बैंक, वन विभाग और सरकारी योजनाओं से जुड़े कामों के लिए इसी मार्ग से गुजरना पड़ता है। बारिश के दिनों में रास्ता दलदल में बदल जाता है। गड्ढों में पानी भरने से वाहन चालकों को उनकी गहराई तक नजर नहीं आती। दोपहिया वाहन फिसलने का खतरा बना रहता है और चारपहिया वाहन जगह-जगह फंस जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सबसे अधिक परेशानी मरीजों, गर्भवती महिलाओं, स्कूली विद्यार्थियों और किसानों को उठानी पड़ती है। किसानों के लिए उपज को बाजार तक पहुंचाना भी चुनौती बन जाता है। बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाना हो या विद्यार्थियों को स्कूल पहुंचना हो, इस बदहाल रास्ते से गुजरना किसी जोखिम से कम नहीं है।
विकास के दावों के बीच सड़क के लिए संघर्ष क्यों?
एक ओर ग्रामीण विकास और बेहतर कनेक्टिविटी के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर कई गांव अब भी पक्की सड़क से वंचित हैं। ग्रामीणों का सवाल है कि जब सड़क योजनाएं गांव-गांव तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है, तब बसाली-कुंडिया मार्ग वर्षों से उपेक्षित क्यों है। ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना विभाग और लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि स्थायी सड़क निर्माण में समय लग रहा है तो कम से कम बारिश के दौरान मुरम, गिट्टी डालकर और पानी निकासी की व्यवस्था कर मार्ग को चलने योग्य बनाया जाना चाहिए था।
‘अब केवल भरोसा नहीं, काम शुरू होना चाहिए’
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रवि कुमार पटेल ने कहा कि सड़क की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिलता है। यदि जल्द निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो ग्रामीण संगठित होकर आंदोलन करेंगे। जनपद सदस्य गणेश मावस्कर, उपसरपंच देवीदास और नंदू पटेल ने भी चेतावनी दोहराते हुए कहा कि सड़क जैसी मूलभूत सुविधा के लिए ग्रामीणों को वर्षों तक संघर्ष करना प्रशासनिक उपेक्षा को दर्शाता है। अब ग्रामीण लिखित आश्वासन नहीं, निर्माण कार्य की शुरुआत चाहते हैं।
धूलकोट सहित कई ग्रामीण मार्ग भी बदहाल
बसाली-कुंडिया ही नहीं, बारिश के कारण जिले के कई ग्रामीण मार्गों की स्थिति खराब हो चुकी है। आदिवासी बाहुल्य धूलकोट क्षेत्र में भी पिछले दिनों खराब रास्तों के कारण स्कूली बच्चों और ग्रामीणों को परेशानी झेलते देखा गया। इसके बाद भी संबंधित विभागों ने समय रहते अस्थायी सुधार के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए। ग्रामीणों ने मांग की कि जिले के बदहाल ग्रामीण मार्गों का तत्काल सर्वे कराया जाए। जहां स्थायी सड़क स्वीकृत नहीं है, वहां प्रस्ताव तैयार किया जाए और बारिश में आवागमन बनाए रखने के लिए अस्थायी सुधार कराया जाए।
कुंडिया फाटा पर हुए विरोध में माधो नाटो, ओमप्रकाश, बद्री वास्कले, पन्ना पटेल, संजय चौकसे, राहुल राठौर और रामदास महाराज सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा—इस बार भी मांग अनसुनी हुई तो आंदोलन के लिए शासन-प्रशासन जिम्मेदार होगा।