-
शिकायत नहीं होती तो क्या दबा रहता मामला? पौधारोपण और गश्त के दावों के बीच फिर उजड़ने लगे जंगल
बुरहानपुर। जिस जंगल को बचाने के लिए ढाई साल पहले प्रशासन, पुलिस और वन विभाग ने लगातार 17 दिन तक मोर्चा संभाला था, वनकर्मियों और ग्रामीणों ने हमले झेले थे तथा अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए बड़ी कार्रवाई की गई थी, उसी नावरा रेंज में एक बार फिर पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने का मामला सामने आया है। हिवरा और सांईखेड़ा बीट में वन कटाई की पुष्टि के बाद डीएफओ विद्याभूषण सिंह ने एक वन परिक्षेत्र सहायक और दो वनरक्षकों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब संवेदनशील वन क्षेत्र में नियमित गश्त और निगरानी के दावे किए जा रहे थे, तो पेड़ कटते रहे और जिम्मेदार अमले को भनक क्यों नहीं लगी? क्या वन क्षेत्र की सुरक्षा केवल कागजों में चल रही थी या सूचना होने के बाद भी समय रहते कार्रवाई नहीं की गई?
शिकायत पहुंची, तब खुली कटाई की परतें
वन विभाग को हिवरा बीट में बड़े पैमाने पर वन कटाई की शिकायत मिली थी। बताया जा रहा है कि एक व्यक्ति ने सीधे डीएफओ के समक्ष मामला रखा, जिसके बाद जांच शुरू हुई। जांच में वन कटाई की पुष्टि होने के साथ ही संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की निगरानी में लापरवाही सामने आई। रिपोर्ट के आधार पर सीवल में पदस्थ वन परिक्षेत्र सहायक शिवनारायण तिवारी, हिवरा बीट के वनरक्षक अनिकेत सिंह राजपूत और सांईखेड़ा बीट के वनरक्षक प्रमोद सिंह सिकरवार को निलंबित कर दिया गया।
यह कार्रवाई वन विभाग के लिए केवल अनुशासनात्मक कदम नहीं, बल्कि अपनी ही निगरानी व्यवस्था पर उठे सवालों का जवाब भी मानी जा रही है। सवाल यह भी है कि यदि शिकायतकर्ता सामने नहीं आता तो क्या वन कटाई का मामला विभाग की फाइलों तक पहुंच पाता?
हमले झेले, जंगल बचाया और पौधे लगाए… फिर वही खतरा
करीब ढाई साल पहले नावरा और नेपानगर रेंज में बाहरी अतिक्रमणकारियों ने बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया था। जंगल बचाने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और वन विभाग ने संयुक्त अभियान चलाया। कार्रवाई लगातार 17 दिनों तक चली थी। इस दौरान वन अमले और ग्रामीणों पर हमले तक हुए, लेकिन टीमों ने पीछे हटने के बजाय जंगल को सुरक्षित करने का अभियान जारी रखा। अतिक्रमण हटाने के बाद प्रभावित क्षेत्र में पौधारोपण किया गया। वन विभाग ने नियमित गश्त और निगरानी के माध्यम से दोबारा कटाई रोकने का दावा भी किया। अब हिवरा में फिर वन कटाई सामने आने से उस पूरे अभियान की मेहनत और पौधारोपण के भविष्य पर खतरा खड़ा हो गया है।
जिम्मेदारी सिर्फ तीन कर्मचारियों तक सीमित या जांच और आगे बढ़ेगी?
तीन वनकर्मियों के निलंबन से विभाग ने सख्ती का संदेश जरूर दिया है, लेकिन वन कटाई के पीछे सक्रिय लोगों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है। पेड़ किसने काटे, लकड़ी कहां पहुंचाई गई, कटाई कितने दिनों से चल रही थी और बीट स्तर की निगरानी व्यवस्था क्यों नाकाम रही—इन सवालों के जवाब अभी सामने आना बाकी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जल, मिट्टी, वन्यजीव और स्थानीय लोगों की आजीविका का आधार हैं। एक बार जंगल उजड़ने के बाद उसकी भरपाई केवल पौधारोपण के आंकड़ों से नहीं हो सकती। पौधे लगाने से कहीं अधिक जरूरी उन्हें पेड़ बनने तक सुरक्षित रखना है।
डीएफओ की कार्रवाई से विभागीय अमले में हलचल है। अब नजर इस बात पर है कि जांच निलंबन तक सीमित रहती है या वन कटाई में शामिल वास्तविक लोगों और संरक्षण व्यवस्था की कमजोरियों तक भी पहुंचेगी।