बुरहानपुर। सपना अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने का था। मेहनत की, कठिन प्रवेश परीक्षा पास की और अमेरिका की यूनिवर्सिटी में दाखिला भी मिल गया। मंजिल सामने थी, लेकिन उसके बीच लाखों रुपए की फीस और विदेश में रहने का खर्च सबसे बड़ी दीवार बनकर खड़ा था। सामान्य परिवार के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था। एक समय जिस सपने को आर्थिक तंगी अधूरा छोड़ सकती थी, उसी सपने को शासन की 59.43 लाख रुपए से अधिक की छात्रवृत्ति ने नई उड़ान दे दी।
यह कहानी बुरहानपुर जिले के शाहपुर निवासी दीपक पिता संतोष चौधरी की है। दीपक आज अमेरिका में Masters of Quantitative Finance जैसे उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर रहे हैं। शाहपुर से अमेरिका तक पहुंचे दीपक का यह सफर केवल एक विद्यार्थी की सफलता नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी भी है जिसमें प्रतिभा के पास लक्ष्य तो था, लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए आर्थिक संसाधन सीमित थे।
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एडमिशन मिला तो खुशी हुई, लेकिन सामने खड़ा था लाखों का खर्च
दीपक बचपन से पढ़ाई में होनहार रहे। परिवार की सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। लगातार मेहनत की और उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने का लक्ष्य बनाया। मेहनत रंग लाई। दीपक ने प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और अमेरिका की यूनिवर्सिटी में दाखिला हासिल कर लिया। यह परिवार के लिए बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन इसी खुशी के साथ एक नई चिंता भी सामने आ गई।
अमेरिका में पढ़ाई की फीस कहां से आएगी? वहां रहने और दूसरे जरूरी खर्चों का इंतजाम कैसे होगा?
विदेश में उच्च शिक्षा पर होने वाला लाखों रुपए का खर्च सामान्य परिवार के बजट से कहीं बड़ा था। प्रतिभा ने दीपक को अमेरिका की यूनिवर्सिटी के दरवाजे तक पहुंचा दिया था, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां उस दरवाजे से आगे बढ़ने में चुनौती बन रही थीं।
जब परिवार के लिए रकम जुटाना मुश्किल था, तब योजना बनी सहारा
इसी दौर में दीपक को मध्यप्रदेश शासन की पिछड़ा वर्ग विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना का सहारा मिला। उन्होंने बुरहानपुर के कार्यालय कलेक्टर, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में योजना के तहत आवेदन किया। विभागीय स्तर पर आवेदन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। दीपक की योग्यता और पात्रता की जांच की गई। प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनकी विदेश में उच्च शिक्षा के लिए 59.43 लाख रुपए से अधिक की आर्थिक सहायता स्वीकृत की गई। यह रकम दीपक और उनके परिवार के लिए सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं थी। इसने उस सबसे बड़ी चिंता को कम किया, जो अमेरिका में दाखिला मिलने के बाद परिवार के सामने खड़ी थी। जिस खर्च के कारण विदेश में पढ़ाई का सपना मुश्किल नजर आ रहा था, उसी राह को छात्रवृत्ति ने आसान कर दिया।
शाहपुर का बेटा अब अमेरिका में पढ़ रहा Quantitative Finance
आज दीपक अमेरिका में Masters of Quantitative Finance की पढ़ाई कर रहे हैं। शाहपुर से निकलकर अमेरिका तक पहुंचा उनका सफर यह बताता है कि बड़े सपने केवल बड़े शहरों या आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं होते। छोटे शहर का विद्यार्थी भी अपनी योग्यता के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान तक पहुंच सकता है। हालांकि ऐसे विद्यार्थियों के लिए आर्थिक संसाधन अक्सर सबसे बड़ी चुनौती होते हैं। दीपक के मामले में सरकारी छात्रवृत्ति ने इसी आर्थिक अंतर को पाटने का काम किया।
59.43 लाख की मदद ने बदला पूरा समीकरण
विदेश में उच्च शिक्षा के लिए 59.43 लाख रुपए से अधिक की सहायता मिलने का सीधा असर दीपक की पढ़ाई पर पड़ा। परिवार पर फीस और अन्य शैक्षणिक खर्चों का भारी दबाव कम हुआ और दीपक अपनी उच्च शिक्षा की राह पर आगे बढ़ सके। दीपक की कहानी उन विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो प्रतिभाशाली होने के बावजूद विदेश में पढ़ाई के खर्च को देखकर अपने कदम पीछे खींच लेते हैं। पात्र विद्यार्थियों तक ऐसी योजनाओं की जानकारी पहुंचे और वे समय पर आवेदन करें तो आर्थिक कमजोरी और उच्च शिक्षा के बीच की दूरी कम हो सकती है।
दीपक बोले—परिवार के लिए अमेरिका में पढ़ाना सपने जैसा था
अपनी इस यात्रा को लेकर दीपक चौधरी कहते हैं, “मेरे परिवार के लिए अमेरिका में पढ़ाई करवाने के बारे में सोचना भी एक सपने जैसा था। मैं शासन-प्रशासन का आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने मेरे भविष्य की राह को आसान बनाया। यह सहायता केवल एक छात्रवृत्ति नहीं, बल्कि मेरे जैसे युवाओं के सपनों पर सरकार का विश्वास है।” दीपक के इन शब्दों में उस परिवार की स्थिति भी दिखाई देती है, जिसके बेटे ने अपनी मेहनत से अवसर तो हासिल कर लिया, लेकिन उस अवसर को हकीकत में बदलने के लिए बड़ी आर्थिक मदद की जरूरत थी।
एक छात्र की सफलता से आगे की कहानी
दीपक की उपलब्धि को केवल विदेश में पढ़ाई कर रहे एक छात्र की सफलता तक सीमित नहीं देखा जा सकता। यह कहानी उन परिवारों की उम्मीद भी बढ़ाती है, जिनके बच्चे पढ़ाई में प्रतिभाशाली हैं लेकिन आर्थिक स्थिति उन्हें बड़े सपने देखने से रोकती है। शाहपुर से शुरू हुआ दीपक का सफर आज अमेरिका तक पहुंच चुका है। प्रवेश उन्होंने अपनी मेहनत और योग्यता से हासिल किया और आर्थिक बाधा पार करने में छात्रवृत्ति ने मदद की। अब उनके सामने अगला लक्ष्य अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर इस अवसर को उपलब्धि में बदलने का है।
कभी लाखों रुपए का खर्च जिस सपने के सामने सबसे बड़ा सवाल था, आज उसी सपने की पढ़ाई अमेरिका में जारी है। दीपक की कहानी का सार भी यही है—संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन अवसर और मेहनत साथ मिल जाएं तो मंजिल की दूरी कम की जा सकती है।



