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श्री इच्छेश्वर हनुमान मंदिर बनाम दरगाह-ए-हकीमी केस में नया मोड़: सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी निर्माण पर लगाई रोक

बुरहानपुर। प्राचीन श्री इच्छेश्वर हनुमान मंदिर और दरगाह-ए-हकीमी ट्रस्ट के बीच वर्षों से चल रहे विवाद में आज सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई और यथास्थिति बनाए रखने (Status Quo) का आदेश जारी किया। मामले की पृष्ठभूमि बुरहानपुर के ग्राम शहादरा लोधीपुरा खसरा

On: February 25, 2025 8:20 PM
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बुरहानपुर हनुमान मंदिर बनाम दरगाह-ए-हकीमी केस - सुप्रीम कोर्ट फैसला

बुरहानपुर। प्राचीन श्री इच्छेश्वर हनुमान मंदिर और दरगाह-ए-हकीमी ट्रस्ट के बीच वर्षों से चल रहे विवाद में आज सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई और यथास्थिति बनाए रखने (Status Quo) का आदेश जारी किया।
Sadaiv Newsमामले की पृष्ठभूमि
बुरहानपुर के ग्राम शहादरा लोधीपुरा खसरा नंबर 12 पर स्थित श्री इच्छेश्वर हनुमान मंदिर को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच विवाद चल रहा है। इस मामले में पूर्व में बुरहानपुर न्यायालय ने स्टेटस को बनाए रखने का आदेश दिया था, लेकिन दरगाह-ए-हकीमी ट्रस्ट के पूर्व मैनेजर ओन अली ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में इस आदेश को चुनौती दी थी। जबलपुर उच्च न्यायालय ने 22 जून 2023 को मंदिर पक्ष के खिलाफ निर्णय सुनाया, जिसके विरुद्ध मंदिर समिति ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका (SLP 020674/2023) दायर की।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और मुख्य बिंदु
1. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक- सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर उच्च न्यायालय के 22 जून 2023 के फैसले पर रोक लगाते हुए “स्टेटस को” (Status Quo) को बनाए रखने का आदेश दिया। इसका मतलब यह है कि मंदिर परिसर की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा और विवादित स्थल पर किसी भी पक्ष द्वारा कोई नई गतिविधि नहीं होगी।
2. स्थायी निर्माण पर रोक- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतिम आदेश आने तक किसी भी प्रकार के स्थायी निर्माण पर रोक लगाई जाती है।
3. मध्य प्रदेश सरकार का हस्तक्षेप और समर्थन- इस केस में मध्य प्रदेश सरकार भी शामिल हो गई।
• सरकार के वकील शारद सिंघानिया ने वर्ष 1951-52, 1954, और 1968 के राजस्व अभिलेख (खसरा) सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किए।
• सरकारी अभिलेखों के अनुसार मंदिर पहले से वहां स्थित था, और 1972 से पहले भी वहां धार्मिक गतिविधियां होती थीं।
• सरकार ने यह भी दलील दी कि पटवारी द्वारा 1973 में दर्ज की गई ‘बजरंग बली’ प्रविष्टि में कोई अनियमितता नहीं थी।
4. मुस्लिम पक्ष की दलीलें सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज
दरगाह-ए-हकीमी ट्रस्ट के पूर्व प्रबंधक ओन अली व अब्दुल कादिर शब्बीर अहमद ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी कि 1972 के पूर्व विवादित स्थल पर कुछ भी नहीं था और हिंदू पक्ष ने 2005 में मंदिर की स्थापना की। लेकिन, सरकारी अभिलेखों और हिंदू पक्ष के वकील विष्णुशंकर जैन की दलीलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया।
Sadaiv Newsक्या बोले हिंदू पक्ष के वकील?
हिंदू पक्ष के वकील विष्णुशंकर जैन ने कहा सुप्रीम कोर्ट ने हमारी अपील को सुनवाई योग्य माना और स्टेटस को जारी रखने का आदेश दिया है। हम अदालत के इस फैसले का स्वागत करते हैं, जो ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है।
क्या बोले मुस्लिम पक्ष के वकील?
दरगाह-ए-हकीमी ट्रस्ट के वकील ने तर्क दिया कि मंदिर का अस्तित्व पूर्व में नहीं था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलीलों को अस्वीकार कर दिया।
अगली सुनवाई और आगे की संभावनाएं
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब इस मामले में अगले चरण की सुनवाई होगी, जिसमें अंतिम फैसला दिया जाएगा। हिंदू पक्ष के लिए यह एक बड़ी कानूनी जीत है क्योंकि उनकी अपील को स्वीकार किया गया है। मध्य प्रदेश सरकार के हस्तक्षेप से मंदिर पक्ष को और मजबूती मिली है। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं।

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