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जब पत्तल में परोसे गए पत्थर… किसान बोले – अब यही खाना बचा है!
खकनार। मध्यप्रदेश के नेपानगर विधानसभा क्षेत्र के खकनार विकासखंड में पांगरी मध्यम सिंचाई परियोजना से प्रभावित किसानों का सब्र अब जवाब देने लगा है। रविवार को किसानों ने सरकार की बेरुखी के खिलाफ विरोध का एक ऐसा तरीका चुना, जिसे देखकर हर आंख भर आई। सैकड़ों किसान शिव मंदिर परिसर में एकत्र हुए — लेकिन हाथों में थाली नहीं थी, पत्तल थी… और उस पर परोसा गया था भोजन नहीं, पत्थर।
पत्थर खाओ आंदोलन: जब इंसान की भूख ने पत्थर को निवाला बना लिया
यह कोई नाटक नहीं था, न ही किसी NGO का ड्रामा। यह उस किसान की चीख थी, जिसकी जमीन डूब गई, लेकिन उसे उसका हक नहीं मिला। किसानों ने सागवान की पत्तलों में बड़े-बड़े पत्थर परोसे और उन्हें खाने की कोशिश की — सांकेतिक तौर पर ही सही, लेकिन सरकार के सामने एक सवाल छोड़ दिया: क्या अब हम पत्थर खाएं? क्या यही हमारा भविष्य है?
287 हेक्टेयर डूब में, 300 किसान प्रभावित — मुआवजा अब तक अधूरा
पांगरी बांध परियोजना के चलते करीब 300 किसानों की 287 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में चली गई है। कई किसानों के पास तो यही एकमात्र सहारा था। लेकिन अब तक उन्हें मुआवजे की राशि पूरी नहीं दी गई। किसानों का कहना है कि सरकार हमें सिर्फ आश्वासन दे रही है, हकीकत में हमें मिला कुछ नहीं। हमें नियमानुसार मुआवजा चाहिए, ताकि हम फिर से खड़े हो सकें।
शिव मंदिर बना गवाह — जहां सिर्फ पूजा नहीं, भूख की पुकार गूंजी
शिव मंदिर, जो अब तक सिर्फ भक्ति का केंद्र था, रविवार को विरोध का केंद्र बन गया। किसानों ने पत्थर से भरे पत्तलों को आगे रखकर जमीन पर बैठकर वही दृश्य रचा, जैसे भोजन के लिए कतार में लोग बैठे हों। लेकिन जब लोगों ने पास जाकर देखा, तो पत्तलों में दाल-रोटी नहीं, पत्थर रखे थे।
कोई पार्टी नहीं, कोई नेता नहीं — सिर्फ किसान और उनकी चुप्पी
इस विरोध में न कोई राजनीतिक झंडा था, न कोई मंच। थी तो सिर्फ चुप्पी, आँखों में आंसू, और होंठों पर सवाल। किसानों का कहना है कि अगर प्रशासन ने अब भी नहीं सुना, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और उग्र होगा।
पत्थर खाना मज़बूरी न बने…
प्रशासन से सवाल — जवाब कौन देगा?
अब सवाल प्रशासन से है —
• जिनकी जमीन डूबी, वो कब तक इंतज़ार करें?
• क्या मुआवजा फाइलों में ही सड़ता रहेगा?
• क्या किसान सिर्फ चुनाव के वक़्त याद किए जाएंगे?