बुरहानपुर। इंदिरा कॉलोनी स्थित गोकुलधाम सोसाइटी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्रद्धा और भक्ति का अनुपम संगम देखने को मिला। कथा व्यास पंडित आदित्य मुखिया जी ने भावपूर्ण प्रवचन में कहा कि भगवान रूप, धन या दिखावे के नहीं बल्कि भक्तों के शुद्ध भाव के भूखे होते हैं। जब भक्त के मन में प्रभु दर्शन की तीव्र आतुरता जागती है, तब ईश्वर स्वयं उसके पास दौड़े चले आते हैं।
उन्होंने कहा कि संत की तरह सरल, निष्कपट और धर्मनिष्ठ व्यक्ति ही सच्चा भक्त होता है और ऐसे भक्तों के हृदय में ही भगवान का वास होता है। जो प्रेम से स्मरण करता है, वही प्रहलाद की तरह परम भक्त कहलाता है।
गजेंद्र और द्रौपदी से बताया भगवान का भक्तवत्सल स्वरूप
पं. मुखियाजी ने गजेंद्र मोक्ष की कथा सुनाते हुए कहा कि जब गजेंद्र ने संकट में कमल पुष्प भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित कर पुकार लगाई, तब भगवान नग्न पांव दौड़ते हुए उसे बचाने आए और मगरमच्छ से उसकी रक्षा की। इसी तरह द्रौपदी चीर हरण के समय जब उसने सारे सहारे छोड़कर प्रभु को पुकारा, तब भगवान ने उसकी लाज बचाई। उन्होंने कहा भगवान भक्तवत्सल हैं, भक्त की पुकार उन्हें रोक नहीं सकती।
जहां राम होते हैं, वहां काम नहीं रहता
कथा में उन्होंने कहा कि जहां राम का वास होता है, वहां सांसारिक वासनाएं समाप्त हो जाती हैं। उन्होंने समय की गणना, 60 सेकंड से लेकर कल्प तक की अवधारणा और एक दिवस का आध्यात्मिक महत्व भी सरल शब्दों में समझाया। भगवान के स्वरूपों का वर्णन करते हुए पं. मुखिया जी ने कहा कि ब्रह्मा का रंग लाल और विष्णु का रंग नीला होता है। जब भगवान शिव ने कालकूट विष पीते समय विष्णु का स्मरण किया तो उनका कंठ नीला हो गया, जिससे वे नीलकंठ कहलाए। उन्होंने वामन अवतार और विराट स्वरूप की दिव्य कथा भी सुनाई।
वामन भगवान का भव्य पूजन
आज के दिन का प्रमुख आकर्षण रहा भगवान वामन का पूजन, जिसे नगर निगम महापौर माधुरी अतुल पटेल और पूर्व महापौर अतुल पटेल ने श्रद्धा और विधि-विधान से संपन्न किया।
श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति
कथा में प्रमुख यजमान माधुरी अतुल पटेल, कथा संयोजक अतुल पटेल, अजय नटवरलाल, महेंद्र पारीक, राजेंद्र जालान, पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह, लक्ष्मी पोद्दार, रश्मि देवड़ा, प्रमोद गढ़वाल, कैलाश शर्मा, महेंद्र पोद्दार, मुकेश डालमिया, महेश जोशी, जिला पंचायत अध्यक्ष गंगाराम मार्को सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के समापन पर ग्रंथ की आरती की गई और श्रद्धालुओं को महाप्रसादी वितरित की गई।