बुरहानपुर। शहर का गुड हॉस्पिटल एक बार फिर विवादों में घिर गया है। अस्पताल का अस्थायी लाइसेंस निरस्त होने के बावजूद मरीजों को भर्ती कर उपचार किए जाने के आरोप सामने आए हैं। मामला गंभीर इसलिए है, क्योंकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा अस्पताल के संचालन पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है। इसके बाद भी यदि अस्पताल में मरीज भर्ती किए जा रहे हैं तो यह सीधे तौर पर सीएमएचओ के आदेशों की अनदेखी माना जा रहा है।
मरीजों और उनके परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर इलाज, सुविधाओं और आयुष्मान भारत योजना को लेकर गुमराह करने के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि भर्ती के समय अलग जानकारी दी गई और बाद में शर्तें बदल दी गईं। परिजनों ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए हैं।
नि:शुल्क इलाज का भरोसा, बाद में आयुष्मान कार्ड की मांग
जानकारी के अनुसार खंडवा क्षेत्र से आए कई मरीज गुड हॉस्पिटल में भर्ती हैं। मरीजों के परिजनों का आरोप है कि भर्ती के समय उन्हें बताया गया था कि उपचार नि:शुल्क किया जाएगा। इसी भरोसे पर मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन बाद में उनसे आयुष्मान कार्ड लाने के लिए कहा गया। परिजनों का कहना है कि यदि शुरुआत में पूरी जानकारी दी जाती तो वे सोच-समझकर निर्णय लेते। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने पहले भरोसा दिलाया और बाद में अलग शर्तें सामने रखीं। इससे मरीजों और परिजनों में नाराजगी है।
जमीन पर लिटाकर इलाज, कई दिनों से सिर्फ ड्रिप लगाने का आरोप
परिजनों ने अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। कुछ मरीजों को छोटे कमरों में जमीन पर लिटाकर उपचार किया जा रहा है। वहीं कुछ मरीज 5 जून से भर्ती हैं, लेकिन उन्हें केवल आईवी यानी ड्रिप लगाकर रखा गया है। परिजनों का कहना है कि मरीजों की बीमारी क्या है, इलाज की प्रक्रिया क्या चल रही है और कितना समय लगेगा—इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही है। इससे मरीजों के परिवार असमंजस में हैं।
छुट्टी मांगने पर कहा- 8 दिन तक डिस्चार्ज नहीं मिलेगा
मरीजों के परिजनों ने यह भी आरोप लगाया है कि जब उन्होंने अस्पताल से छुट्टी लेकर मरीज को दूसरे अस्पताल में दिखाने की इच्छा जताई, तो उन्हें बताया गया कि 8 दिनों तक डिस्चार्ज नहीं दिया जाएगा। इस पर परिजनों ने नाराजगी जताई। परिजनों का कहना है कि मरीज और परिवार को अपने उपचार का निर्णय लेने का अधिकार है। यदि वे अन्य अस्पताल में इलाज कराना चाहते हैं, तो उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए। डिस्चार्ज नहीं देने की बात से परिजनों में अस्पताल प्रबंधन को लेकर और संदेह बढ़ गया है।
आयुष्मान योजना के नाम पर भ्रमित करने की शिकायत
मरीज के परिजन सुमित वारूडे ने आरोप लगाया कि आयुष्मान भारत योजना के नाम पर मरीजों को गुमराह किया जा रहा है। उनके अनुसार भर्ती के समय अलग जानकारी दी जाती है और बाद में आयुष्मान कार्ड के नाम पर अलग शर्तें रखी जाती हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मामलों में सामान्य बीमारी को गंभीर बताकर आयुष्मान योजना के तहत बड़े बिल बनाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन परिजनों की शिकायतों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
8 मई को एक माह के लिए निरस्त हुआ था अस्थायी लाइसेंस
जिला स्वास्थ्य विभाग ने गुड हॉस्पिटल के संचालन को लेकर पूर्व में कार्रवाई की थी। बताया जा रहा है कि अस्पताल में विभिन्न कमियां और मानकों का पालन नहीं पाए जाने पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने 8 मई को अस्पताल का अस्थायी लाइसेंस एक माह के लिए निरस्त कर दिया था। साथ ही अस्पताल प्रबंधन को कमियां दूर करने के निर्देश दिए गए थे। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार लाइसेंस निरस्त रहने की अवधि में भर्ती मरीजों को अन्य अस्पतालों में शिफ्ट करने के निर्देश भी दिए गए थे। ऐसे में नए मरीजों की भर्ती का मामला सामने आना गंभीर माना जा रहा है।
सीएमएचओ बोले- आदेशों का उल्लंघन हुआ तो होगी कार्रवाई
सीएमएचओ डॉ. राजेद्र वर्मा का कहना है कि गुड हॉस्पिटल मानकों के अनुरूप संचालित नहीं पाया गया था, इसलिए अस्थायी रूप से लाइसेंस निरस्त किया गया था। अस्पताल को आवश्यक कमियां पूरी करने के निर्देश दिए गए थे। उन्होंने कहा कि यदि लाइसेंस निरस्तीकरण अवधि के दौरान अस्पताल द्वारा नए मरीजों को भर्ती किया गया है या आदेशों का उल्लंघन हुआ है, तो इसकी जांच की जाएगी। जांच में शिकायत सही पाए जाने पर नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
अस्पताल प्रबंधन ने आरोपों को बताया निराधार
वहीं दूसरी ओर अस्पताल संचालक ने मरीजों और परिजनों के आरोपों को निराधार बताया है। संचालक का कहना है कि अस्पताल में पर्याप्त व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं और मरीजों का उपचार आयुष्मान योजना सहित अन्य प्रावधानों के तहत किया जा रहा है। अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है और किसी को गुमराह नहीं किया गया है।
बड़ा सवाल: लाइसेंस निरस्त था तो भर्ती कैसे हुई?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अस्पताल का अस्थायी लाइसेंस निरस्त था, तो मरीज भर्ती कैसे किए गए? यदि अस्पताल को मरीजों को शिफ्ट करने के निर्देश दिए गए थे, तो क्या स्वास्थ्य विभाग ने बाद में निरीक्षण किया? क्या अस्पताल ने कमियां दूर कर ली थीं? क्या नए मरीज भर्ती करने की अनुमति दी गई थी? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल मरीजों के आरोप, अस्पताल प्रबंधन के दावे और स्वास्थ्य विभाग के बयान के बीच मामला उलझा हुआ है।
जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
गुड हॉस्पिटल को लेकर उठे इस नए विवाद ने शहर में स्वास्थ्य सेवाओं और निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतों के बाद अब सभी की निगाहें स्वास्थ्य विभाग की जांच पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है। वहीं अस्पताल प्रबंधन के दावों की सच्चाई भी जांच के बाद स्पष्ट होगी। फिलहाल यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है और स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है।