बुरहानपुर। ग्राम बहादरपुर स्थित सीनियर अनुसूचित जाति कन्या छात्रावास में वार्डन की पदस्थापना का मामला अब प्रशासनिक मांग से आगे बढ़कर विवाद का रूप लेता नजर आ रहा है। मंगलवार को छात्रावास की छात्राएं एबीवीपी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंच गईं। छात्राओं ने जनसुनवाई में अधिकारियों के सामने मांग रखी कि सीमा करोड़ा को छात्रावास की वार्डन बनाया जाए। लेकिन छात्राओं की मांग पर विभाग का जवाब चौंकाने वाला रहा। जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त ने स्पष्ट कहा कि सीमा करोड़ा को छात्रावास से हटाया ही नहीं गया है। छात्रावास का अतिरिक्त प्रभार फिलहाल उन्हीं के पास है। जब वह पहले से प्रभार संभाल रही हैं तो अलग से नया आदेश जारी करने का सवाल ही नहीं उठता।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जब सीमा करोड़ा पहले से छात्रावास का प्रभार देख रही हैं, तो छात्राओं को कलेक्ट्रेट तक किसने भेजा? क्या प्रशासन पर स्थायी पदस्थापना का दबाव बनाने के लिए बच्चियों को आगे किया गया? प्रशासनिक तबादले और पदस्थापना जैसे मामलों में विद्यार्थियों की भागीदारी लगातार बढ़ने से अधिकारियों के साथ आम लोगों ने भी इस प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई है।
छात्राएं बोलीं—छात्रावास में वार्डन नहीं, हमें सीमा करोड़ा ही चाहिए
जनसुनवाई में पहुंचीं छात्राओं ने अधिकारियों से कहा कि छात्रावास में वर्तमान में नियमित वार्डन नहीं है। उनकी देखरेख और छात्रावास की व्यवस्थाओं के लिए सीमा करोड़ा को वार्डन नियुक्त किया जाए। सीमा करोड़ा वर्तमान में बहादरपुर स्थित आदिवासी बालक आश्रम में पदस्थ हैं। इसके साथ ही वह सीनियर अनुसूचित जाति कन्या छात्रावास का अतिरिक्त प्रभार भी देख रही हैं। इसके बावजूद छात्राओं ने उनकी नियमित पदस्थापना की मांग उठाई। छात्राओं के साथ एबीवीपी से जुड़े कार्यकर्ता और पदाधिकारी भी कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। इससे मामला केवल छात्रावास की आंतरिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक दबाव और संगठनात्मक हस्तक्षेप से भी जोड़कर देखा जाने लगा है।
खंडवा तबादला होने के बाद तीन बार चार्ज देने पहुंचीं अधीक्षिका
बहादरपुर कन्या छात्रावास में पदस्थ अधीक्षिका का भोपाल स्तर से खंडवा तबादला हो चुका है। बताया जा रहा है कि तबादले के बाद वह तीन बार छात्रावास का चार्ज सौंपने के लिए बहादरपुर पहुंच चुकी हैं, लेकिन अब तक चार्ज की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त भरत जांचपुरे ने कहा कि छात्राएं सीमा करोड़ा को वार्डन बनाए जाने की मांग लेकर आई थीं, जबकि विभाग ने सीमा करोड़ा को छात्रावास के प्रभार से हटाया ही नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस अधीक्षिका का खंडवा तबादला हुआ है, वह गर्भवती हैं। वह तीन बार चार्ज देने के लिए आ चुकी हैं, लेकिन सीमा करोड़ा ने चार्ज नहीं लिया। वर्तमान में सीमा करोड़ा ही छात्रावास की अधीक्षिका का काम संभाल रही हैं। ऐसे में विभाग उनकी पदस्थापना को लेकर नया आदेश जारी नहीं कर सकता। विभागीय जवाब के बाद छात्राओं की मांग पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। जब काम पहले से वही अधिकारी कर रही हैं, तो नए आदेश की मांग आखिर किस उद्देश्य से उठाई जा रही है?
11 महीने पहले विवाद के बाद हटाई गई थीं सीमा करोड़ा
सीमा करोड़ा का नाम इससे पहले भी छात्रावास से जुड़े एक विवाद में सामने आ चुका है। वह बुरहानपुर के महाविद्यालयीन अनुसूचित जाति कन्या छात्रावास में अधीक्षिका के पद पर पदस्थ थीं। करीब 11 महीने पहले जन्माष्टमी के कार्यक्रम के दौरान बिना अनुमति बाहरी पुरुषों को छात्रावास में प्रवेश देने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। मामला सामने आने के बाद विभाग ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया था और छात्रावास के अधीक्षिका पद से हटा दिया था। इसके बाद उन्हें उनके मूल पद एकीकृत माध्यमिक शाला बाकड़ी भेजा गया, लेकिन वहां ज्वाइनिंग नहीं दी गई। कुछ समय बाद उन्हें बहादरपुर स्थित आदिवासी बालक आश्रम में अध्यापन कार्य के लिए पदस्थ किया गया। अब बहादरपुर कन्या छात्रावास की अधीक्षिका का खंडवा तबादला होने के बाद सीमा करोड़ा वहां अस्थायी रूप से अतिरिक्त प्रभार संभाल रही हैं। इसी बीच छात्राओं को उनके पक्ष में कलेक्ट्रेट पहुंचाकर स्थायी पदस्थापना की मांग उठाए जाने से पुराने विवाद ने भी दोबारा तूल पकड़ लिया है।
बच्चों के कंधे पर रखकर प्रशासन पर दबाव?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल बच्चों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। प्रशासनिक पदस्थापना, तबादला और प्रभार जैसे फैसले विभागीय स्तर पर लिए जाते हैं। इसके बावजूद छात्राओं को कलेक्ट्रेट पहुंचाकर किसी विशेष व्यक्ति की पदस्थापना की मांग कराना कई सवाल खड़े कर रहा है। लोगों का कहना है कि बच्चों को अपनी समस्याएं रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन उन्हें किसी अधिकारी, शिक्षक या वार्डन की नियुक्ति और तबादले के लिए दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करना गलत परंपरा है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि छात्राओं की आड़ लेकर विभाग पर दबाव बनाया जा रहा है। प्रशासन ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है, क्योंकि जिले में कुछ ही दिनों के भीतर यह दूसरा मामला है, जब बच्चों को किसी कर्मचारी की पदस्थापना अथवा तबादले से जुड़े मुद्दे पर आगे किया गया।
खातला में भी बच्चों को पांच किलोमीटर पैदल चलाया गया था
कुछ दिन पहले खातला हायर सेकंडरी स्कूल के विद्यार्थियों ने शिक्षक का तबादला रुकवाने के लिए जनसुनवाई तक पैदल जाने का प्रयास किया था। बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्कूल से निकलकर कलेक्ट्रेट की ओर पैदल चल पड़े थे। बच्चे करीब पांच किलोमीटर दूर ग्राम पुरा तक पहुंच गए थे। प्रशासन को इसकी जानकारी लगी तो एसडीएम और शिक्षा विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने बच्चों को समझाइश दी और वापस स्कूल भेजा। उस समय भी सवाल उठा था कि बच्चों को प्रशासनिक निर्णय बदलवाने के लिए किसने प्रेरित किया। अब बहादरपुर कन्या छात्रावास की छात्राओं के कलेक्ट्रेट पहुंचने से यह मामला केवल संयोग नहीं, बल्कि एक नई और चिंताजनक प्रवृत्ति के रूप में देखा जा रहा है।
जांच जरूरी—छात्राओं को किसने भेजा, किसके कहने पर बनी रणनीति?
मामले में प्रशासन के सामने अब केवल वार्डन की पदस्थापना का प्रश्न नहीं है। यह जांच भी जरूरी हो गई है कि छात्राओं को कलेक्ट्रेट लाने का निर्णय किसने लिया। क्या छात्राओं ने स्वयं यह मांग उठाई या किसी कर्मचारी, अधिकारी अथवा संगठन ने उन्हें इसके लिए तैयार किया? यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जब सीमा करोड़ा पहले से प्रभार संभाल रही हैं, तो उनके नाम से नया आदेश जारी कराने की मांग क्यों की जा रही है। क्या अस्थायी प्रभार को स्थायी पदस्थापना में बदलवाने की कोशिश हो रही है या इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक हित जुड़ा है? बच्चियों की सुरक्षा, शिक्षा और मानसिक स्थिति से जुड़े छात्रावासों में पदस्थापना के फैसले नियमों, योग्यता और विभागीय जांच के आधार पर होने चाहिए, न कि विद्यार्थियों को भीड़ के रूप में कलेक्ट्रेट भेजकर।
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जनसुनवाई में गूंजे वेतन, पीएफ और सरकारी सहायता के मुद्दे
तीन महीने से वेतन नहीं, हर बार जनसुनवाई के बाद मिलता है पैसा
जिला अस्पताल में पदस्थ सुरक्षा गार्ड भी मंगलवार को जनसुनवाई में अपनी समस्या लेकर पहुंचे। गार्डों ने आरोप लगाया कि उन्हें पिछले तीन महीने से वेतन नहीं मिला है। सुरक्षा गार्डों ने कहा कि यह पहली बार नहीं है। हर तीन महीने में उनका वेतन रोक दिया जाता है। जब वे जनसुनवाई में शिकायत करते हैं, तभी भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। गार्डों ने ठेकेदार कंपनी पर पिछले छह महीने से पीएफ की राशि खातों में जमा नहीं करने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि वे नियमित रूप से ड्यूटी कर रहे हैं, लेकिन समय पर वेतन नहीं मिलने से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। कई गार्ड बच्चों की स्कूल फीस तक जमा नहीं कर पा रहे हैं। घर का राशन, बिजली बिल और अन्य खर्चों के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ रहा है। उन्होंने प्रशासन से बकाया वेतन और पीएफ की राशि तत्काल दिलाने की मांग की।
कोरोना में पति की मौत, दो बच्चों की मां अब तक योजना के लाभ से वंचित
नगर निगम अध्यक्ष अनीता यादव भी कुछ हितग्राहियों के साथ जनसुनवाई में पहुंचीं। उन्होंने बाल विकास योजना की राशि पात्र हितग्राहियों को नहीं मिलने पर नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि श्याम पिता रघुनाथ पाटील का कोरोना काल में निधन हो गया था। उनकी पत्नी किरण श्याम पाटील के दो बच्चे हैं। पति की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है, लेकिन अब तक महिला को बाल विकास योजना का लाभ नहीं मिला। महिला ने कई बार सहायता की मांग की, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा। नगर निगम अध्यक्ष ने अधिकारियों के सामने नाराजगी जताते हुए पात्र परिवार को योजना की राशि जल्द दिलाने की मांग की। जनसुनवाई में आए इन मामलों ने एक बार फिर सरकारी व्यवस्था की सुस्ती उजागर कर दी। कहीं नियमित ड्यूटी के बाद भी सुरक्षा गार्डों को वेतन के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, तो कहीं पति की मौत के वर्षों बाद भी एक महिला सरकारी सहायता से वंचित है।



