बुरहानपुर/खकनार। एक ओर देश दीपावली की तैयारियों में रोशनियों से जगमगा रहा है, वहीं मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के खकनार गांव का एक किसान त्योहार से पहले ही अपना दर्द दुनिया के सामने ला खड़ा हुआ है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में किसान किशोर वासनकर शर्ट और चप्पल उतारकर खड़ा है। आंखों में आंसू और आवाज़ में पीड़ा लिए वह कहता है जब तक केला फसल बीमा लागू नहीं होगा, मैं कपड़े नहीं पहनूंगा… हमारी दीपावली कैसी होगी, जब खेत ही वीरान हैं और जेब खाली है?
देश का केला हब, लेकिन न सुरक्षा, न सम्मान
बुरहानपुर देश के सबसे बड़े केला उत्पादक जिलों में से एक है। यहां हजारों किसान अपनी आजीविका केवल केला फसल पर निर्भर करते हैं। लेकिन विडंबना ये है कि यहां के किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ नहीं मिलता। महाराष्ट्र में केला किसानों को बीमा मिलता है, बुरहानपुर के किसान सिर्फ फॉर्म और वादों के भरोसे खड़े हैं।
किशोर वासनकर ने बताया केले की लागत 100 से 150 रुपए प्रति पौधा आती है, और बाजार में 2 से 5 रुपये में बिक रहा है। लागत तो दूर, मजदूरी भी नहीं निकल रही। न बीमा है, न मुआवजा।
वायरल वीडियो में किसान ने क्या कहा?
- मैंने शर्ट और चप्पल त्याग दी है।
- जब तक केले की फसल का बीमा लागू नहीं होगा, कपड़े नहीं पहनूंगा।
- हमारे बच्चे पूछ रहे हैं दीपावली कब आएगी… लेकिन घर में न मिठाई है, न दीये जलाने को तेल।
- महाराष्ट्र के किसान सुरक्षित हैं, हम क्यों नहीं?
क्यों टूट रहा किसानों का धैर्य?
| कारण | किसानों का दर्द |
| बीमा योजना बंद | 2018-19 में आखिरी बार केले की फसल बीमा में शामिल हुई थी। उसके बाद से केंद्र सरकार की तरफ से कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं। |
| प्राकृतिक आपदाएँ | तेज हवा, तूफान, बारिश और CMV वायरस हर साल केला फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। |
| मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरा जैसा | केवल राजस्व नियम आरबीसी 6-4 के तहत राहत मिलती है, वो भी लागत के मुकाबले बहुत कम। |
| बाजार भाव ध्वस्त | किसान 100 रुपये लगाकर, 3-5 रुपये में केला बेचने को मजबूर। |
| त्योहार फीका | दीपावली नहीं, हमारे घर में अंधेरा है… – किसानों की पीड़ा। |
नेताओं ने भी उठाया मुद्दा, लेकिन समाधान अब तक अधर में
- सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने इस मुद्दे को दो बार संसद में उठाया।
- नेपानगर की विधायक मंजू दादू ने विधानसभा में आवाज़ उठाई, लेकिन फसल बीमा पर अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं।
- किसान संगठनों का कहना है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो जिला स्तर पर बड़ा आंदोलन हो सकता है।
किसानों की तीन मुख्य मांगें
- केला फसल को फिर से फसल बीमा योजना में शामिल किया जाए।
- केले की खरीद एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर की जाए।
- प्राकृतिक आपदा में सीधा मुआवजा, न कि केवल कागजी जांच।
ग्राउंड रिपोर्ट कहती है…
- खेतों में पीले-हरे केले नहीं, बल्कि सूखे पत्ते और टूटी उम्मीदें हैं।
- गांव में बच्चे नई कपड़े की जगह पुराने कुर्ते को सिलकर पहन रहे हैं।
- महिलाएं कह रही हैं हम बाजार नहीं जा पा रहे, क्योंकि घर के पुरुषों ने कपड़े ही उतार दिए विरोध में।
अंत में… सवाल सरकार से, जवाब आने वाली पीढ़ी से
किसानों का ये विरोध सिर्फ कपड़े उतारने का नहीं, बल्कि सम्मान छिन जाने की पीड़ा है। दीपावली की जगमगाहट उनके घर तक पहुंचेगी या नहीं – यह अब सरकार के फैसले पर टिका है।