बुरहानपुर। वैष्णवी चौहान मौत मामले में लालबाग रोड स्थित हकीमी अस्पताल की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) द्वारा नर्सिंग होम का पंजीयन और लाइसेंस निरस्त किए जाने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने जबलपुर हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिलने की बात सामने आ रही है। हाईकोर्ट में दायर अपील को लेकर अब स्पष्ट टकराव वाले बयान सामने आए हैं—एक ओर पीड़ित पक्ष के वकील अपील खारिज होने का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर अस्पताल संचालक इसे भ्रामक प्रचार बता रहे हैं।
हाईलेवल जांच के बाद सीएमएचओ की कार्रवाई
लालबाग रोड स्थित हकीमी अस्पताल का नर्सिंग होम पंजीयन और लाइसेंस सीएमएचओ डॉ. आर.के. वर्मा ने निरस्त किया था। यह कार्रवाई कलेक्टर द्वारा गठित जांच समिति की अनुशंसा पर की गई। जांच की जिम्मेदारी एडीएम वीर सिंह चौहान को सौंपी गई थी। जांच में अस्पताल में पर्याप्त संसाधनों, आवश्यक सुविधाओं और नियमों के पालन में गंभीर खामियां सामने आने की बात कही गई।
हाईकोर्ट से राहत नहीं: पीड़ित पक्ष का दावा
वैष्णवी चौहान पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे जबलपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता एम.के. त्रिपाठी ने साफ कहा कि हकीमी अस्पताल की ओर से लगाई गई अपील खारिज कर दी गई है। उन्होंने बताया कि हाईलेवल कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सीएमएचओ द्वारा लाइसेंस निरस्तीकरण किया गया था। जांच में नियमों के उल्लंघन और संसाधनों की कमी उजागर हुई थी। इसी वजह से अस्पताल को हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि अस्पताल से जुड़ी डॉक्टर डॉ. रेहाना बोहरा जिला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ होने के साथ निजी नर्सिंग होम भी संचालित कर रही थीं, जिससे मामला और गंभीर हो गया।
संचालक का दावा–हमने खुद ली लिबर्टी
वहीं हकीमी अस्पताल के संचालक डॉ. मुफद्दल बोहरा ने अपील खारिज होने की बात को सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने उन्हें यह विकल्प दिया था कि वे मामले को मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर सुनवाना चाहते हैं या अपीलिंग अथॉरिटी के पास जाना चाहते हैं।
डॉ. बोहरा के मुताबिक अस्पताल प्रबंधन ने स्वयं लिबर्टी लेकर केस विड्रॉ किया है और अब अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष मामला रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि उनकी अपील गुण-दोष पर खारिज नहीं हुई है और इस मुद्दे पर गलत और भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जांच में बताई गई कमियों को दूर कर दोबारा लाइसेंस के लिए आवेदन किया जाएगा।
यह है पूरा मामला: कैसे शुरू हुआ विवाद
11 नवंबर को हकीमी अस्पताल में जैनाबाद निवासी वैष्णवी नागेश चौहान की गर्भाशय ऑपरेशन के दौरान मौत हो गई थी। परिजनों ने अस्पताल पर गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप लगाए। अगले दिन महिला अधिकारी की मौजूदगी में डॉक्टरों के पैनल से पोस्टमार्टम कराया गया।
करीब 20 दिनों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से आक्रोशित परिजन शनवारा गेट के पास क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठ गए। हड़ताल के पांचवें दिन सांसद ज्ञानेश्वर पाटील मौके पर पहुंचे और परिजनों से चर्चा कर आंदोलन समाप्त कराया। उसी शाम सीएमएचओ ने अस्पताल का नर्सिंग होम पंजीयन और लाइसेंस निरस्त कर दिया।
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट में अपील को लेकर विरोधाभासी दावों के बीच साफ है कि हकीमी अस्पताल पर कानूनी शिकंजा अभी ढीला नहीं पड़ा है। एक ओर पीड़ित परिवार न्याय की मांग पर अडिग है, तो दूसरी ओर अस्पताल प्रबंधन आगे की कानूनी लड़ाई की तैयारी में जुटा है। यह मामला अब सिर्फ एक अस्पताल या एक घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि निजी अस्पतालों की जवाबदेही, प्रशासनिक कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।