बुरहानपुर। “हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए…”। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ देशभर के एक करोड़ कर्मचारियों की पीड़ा को बयान कर रही हैं। सवाल साफ है — जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीएसटी की दरें घटाकर व्यापारियों और आम जनता को राहत दे सकते हैं, तो पुरानी पेंशन स्कीम (OPS) लागू कर कर्मचारियों को क्यों नहीं राहत दी जा रही?
महासंघ का सीधा सवाल: राहत कब मिलेगी?
मध्यप्रदेश कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष और नेशनल मूवमेंट ऑफ ओल्ड पेंशन स्कीम के संयोजक ठाकुर संतोष सिंह दीक्षित ने कहा प्रधानमंत्री जी ने व्यापारियों को राहत दी, इसके लिए हम उनका आभार मानते हैं। लेकिन सवाल यह है कि एक करोड़ NPSधारी कर्मचारियों को कब राहत मिलेगी? हम भी लोकतंत्र का हिस्सा हैं। फिर हमें पेंशन का हक क्यों नहीं मिलता?
नेताओं की पेंशन पर तंज
कर्मचारियों का सबसे बड़ा दर्द यही है कि नेता चुनाव जीतते ही पेंशन के हकदार बन जाते हैं। अगर कोई नेता लगातार 25-30 साल चुनाव जीतता है, तो उसे 5-6 अलग-अलग पेंशन मिलती हैं। जबकि कर्मचारी 30-40 साल सेवा करने के बाद भी हाथ खाली रह जाते हैं। सवाल उठता है क्या कर्मचारी इस देश के नागरिक नहीं हैं?
शेयर बाजार में क्यों धकेला?
संयुक्त मोर्चा के जिला अध्यक्ष डॉ. अशफाक खान, संयोजक धर्मेंद्र चौकसे, अनिल बाविस्कर, विजय राठौड़, राजेश साल्वे, प्रमिला सगरे, कल्पना पवार समेत कई नेताओं ने कहा जब नौकरी हम सरकार की करते हैं तो फिर पेंशन के लिए हमें शेयर बाजार के भरोसे क्यों छोड़ा जाता है? अगर NPS इतना ही अच्छा है तो नेता खुद उसमें क्यों नहीं आते?
भीख नहीं, अधिकार चाहिए
कर्मचारियों का कहना है, हम कोई भीख नहीं मांग रहे। यह हमारा संवैधानिक अधिकार है। सरकार अपने नेताओं को OPS का लाभ देती है, तो कर्मचारियों को इससे क्यों वंचित रखती है? अगर सरकार नई पेंशन स्कीम को सही मानती है तो पहले नेताओं को उसी में शामिल करे। तभी देश को समझ आएगा OPS और NPS का फर्क।
आंदोलन और आक्रोश बढ़ रहा
राज्य और केंद्र, दोनों सरकारों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि OPS की मांग अब आंदोलन का रूप ले रही है। अगर समय रहते सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो यह बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।