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बुरहानपुर कांग्रेस में मंच की कुर्सी पर मचा सियासी घमासान

मंच से नाराज पूर्व विधायक पत्रकार दीर्घा में जा बैठे: कहा- जब तक कांग्रेस की सरकार नहीं बनेगी, मंच साझा नहीं करूंगा बुरहानपुर। सोमवार को कांग्रेस की पत्रकार वार्ता उस वक्त राजनीतिक गर्माहट में बदल गई, जब पूर्व विधायक ठाकुर सुरेन्द्र सिंह को मंच पर उचित स्थान नहीं मिला। गुस्से में उन्होंने मंच पर बैठने […]

  • मंच से नाराज पूर्व विधायक पत्रकार दीर्घा में जा बैठे: कहा- जब तक कांग्रेस की सरकार नहीं बनेगी, मंच साझा नहीं करूंगा

बुरहानपुर। सोमवार को कांग्रेस की पत्रकार वार्ता उस वक्त राजनीतिक गर्माहट में बदल गई, जब पूर्व विधायक ठाकुर सुरेन्द्र सिंह को मंच पर उचित स्थान नहीं मिला। गुस्से में उन्होंने मंच पर बैठने से इनकार करते हुए सीधा पत्रकार दीर्घा में जाकर अपनी जगह ले ली। घटना शहर में चर्चा का विषय बनी रही। बुरहानपुर कांग्रेस में मंच की कुर्सी पर मचा सियासी घमासान देखने को मिला।
दरअसल कांग्रेस प्रवक्ता निखिल खंडेलवाल ने सम्मानपूर्वक उन्हें अपनी सीट पर बैठने का आग्रह किया। लेकिन पूर्व विधायक ने दो टूक जवाब दिया: “जब तक कांग्रेस की सरकार नहीं बनती, मैं मंच साझा नहीं करूंगा। मैं सिर्फ हमारे नेता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बताए रास्ते पर चलूंगा।” इस बयान के बाद मंच और सभा स्थल पर कुछ क्षण के लिए सन्नाटा पसर गया। वरिष्ठ नेता भी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
ये कांग्रेस के नहीं, सिर्फ परिवार के नेता हैं – पूर्व पदाधिकारी का तंज
इस घटनाक्रम पर कांग्रेस के एक पूर्व पदाधिकारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ठाकुर सुरेन्द्र सिंह पर निजी एजेंडे चलाने का आरोप लगाते हुए कहा: ठाकुर साहब कांग्रेस के आंदोलनों में कभी भाजपा या उसकी सरकार के खिलाफ नहीं बोले। वे केवल अपने परिवार की राजनीति करते हैं। कांग्रेस को मज़बूत करने या जनता की लड़ाई में इनकी कोई भूमिका नहीं रही है। नेता ने कहा कि ऐसे व्यवहार से जनता में पार्टी की छवि खराब होती है।
घटना के मायने: व्यक्तिगत नाराज़गी या पार्टी में गुटबाज़ी?
राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह केवल मंच पर स्थान ना मिलने की नाराज़गी थी, या फिर पार्टी के भीतर पुराने गुटीय मतभेद फिर से उभर रहे हैं? विशेषज्ञ मानते हैं कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में ‘दिग्विजय बनाम बाकी’ की खेमेबाज़ी लंबे समय से चली आ रही है। इस घटना ने एक बार फिर उस दरार को सामने ला दिया है।
सवाल जो अब उठने लगे हैं
• क्या पूर्व विधायक को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?
• कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं के सम्मान को लेकर भेदभाव है?
• या यह पार्टी हाईकमान को सार्वजनिक संदेश देने की रणनीति थी?
सदैव व्यू
कांग्रेस जब सत्ता से बाहर होती है, तब भीतर के विरोध ज्यादा ज़ोर से उभरते हैं। यह घटना सिर्फ एक ‘कुर्सी’ की नहीं, कांग्रेस के भीतर सम्मान, नेतृत्व और महत्वाकांक्षा की खामोश जंग की प्रतीक है।
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