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पहले अस्पताल सील, फिर खुलने की तैयारी: कार्रवाई पर भारी पड़ रहा राजनीतिक रसूख? सांसद बोले—दोषी अस्पताल हो या अफसर, कार्रवाई हो

दो माह में कई निजी अस्पतालों पर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई; गुड हॉस्पिटल को लेकर पहले भी सामने आई थीं गंभीर अनियमितताएं, अब दोबारा संचालन की अनुमति पर सवाल | ग्लोबल हॉस्पिटल की जांच महज 10 मिनट में निपटाने का आरोप | सांसद ज्ञानेश्वर पाटील बोले—कलेक्टर और स्वास्थ्य मंत्री से करूंगा चर्चा

बुरहानपुर। जिले में निजी अस्पतालों पर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई जितनी सुर्खियों में है, उससे कहीं ज्यादा सवाल अब कार्रवाई के बाद अस्पतालों को मिलने वाली राहत पर खड़े हो रहे हैं। कहीं अस्पताल सील किया गया, कहीं पंजीयन अथवा संचालन पर रोक लगाई गई, लेकिन कुछ समय बाद दोबारा संचालन की राह खुलने की खबरों ने स्वास्थ्य विभाग की पूरी कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप यह भी लग रहे हैं कि अस्पताल संचालकों का राजनीतिक रसूख कार्रवाई पर भारी पड़ रहा है।

पिछले कुछ महीनों में गुड हॉस्पिटल सहित अन्य निजी अस्पतालों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग ने अनियमितताओं को लेकर कार्रवाई की है। अगस्त में गरकल अस्पताल के लाइसेंस और पंजीयन पर भी स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई की खबर सामने आई थी। इसके बावजूद कार्रवाई के बाद अस्पतालों को किस आधार पर दोबारा अनुमति दी जा रही है, कमियां वास्तव में दूर हुईं या नहीं और जिम्मेदार लोगों पर आगे क्या कार्रवाई हुई—अब इन्हीं सवालों को लेकर मामला गरमा रहा है।

गुड हॉस्पिटल सील हुआ, अब दोबारा अनुमति पर सवाल

अमरावती रोड स्थित गुड हॉस्पिटल के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पहले ही चर्चा में रही है। जुलाई में अस्पताल को जांच के बाद सील किए जाने की खबर सामने आई थी। उस समय गंभीर अनियमितताएं मिलने का दावा किया गया था। अगस्त में प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में 50 बेड की अनुमति के मुकाबले 100 से अधिक मरीज भर्ती मिलने की बात कही गई थी और आयुष्मान योजना के तहत हुए करीब 4 करोड़ रुपए के इलाज की जांच की मांग भी उठी थी। अब गुड हॉस्पिटल को दोबारा संचालन की अनुमति मिलने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल को 35 बेड के संचालन की अनुमति दिए जाने के बाद शिकायतकर्ताओं ने सुरक्षा व्यवस्था और पूर्व में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। यहीं सबसे बड़ा सवाल है—अगर सील करने के समय अनियमितताएं इतनी गंभीर थीं तो बाद में क्या-क्या सुधार हुए? किस टीम ने उनका भौतिक सत्यापन किया? और पहले सामने आए मामलों में जिम्मेदारी किसकी तय हुई? प्रशासन को इन सवालों का रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट जवाब देना होगा।

सील करना ही कार्रवाई या जिम्मेदारी भी होगी तय?

गुड हॉस्पिटल के मामले में आयुष्मान योजना से संबंधित गड़बड़ियों के आरोप भी सामने आए थे। हालांकि इन आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित मानना उचित नहीं होगा जब तक सक्षम जांच एजेंसी की रिपोर्ट सामने न आए। सवाल यह है कि यदि जांच में वित्तीय या अन्य गंभीर अनियमितता प्रमाणित होती है तो क्या केवल अस्पताल का संचालन रोकना पर्याप्त होगा या संबंधित प्रावधानों के तहत संचालक और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी? इसी बीच गरकल अस्पताल के लाइसेंस और पंजीयन के निलंबन की कार्रवाई भी सामने आ चुकी है। लगातार कार्रवाई से यह तो स्पष्ट है कि निजी अस्पतालों की व्यवस्थाओं में कमियां मिलने पर विभाग सक्रिय हुआ है, लेकिन कार्रवाई के बाद की प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी होना जरूरी है।

ग्लोबल हॉस्पिटल की जांच पर नया विवाद, ‘10 मिनट में लौट गए अफसर’ का आरोप

अब ग्लोबल हॉस्पिटल की जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी जांच के लिए पहुंचे, लेकिन करीब 10 मिनट में ही लौट गए। शिकायत करने वालों का सवाल है कि अस्पताल के दस्तावेज, चिकित्सकीय स्टाफ, बेड क्षमता, फायर सेफ्टी, पंजीयन, मरीजों के रिकॉर्ड और अन्य जरूरी मानकों की विस्तृत पड़ताल इतने कम समय में कैसे पूरी हो सकती है? हालांकि जांच की वास्तविक अवधि, उसमें देखे गए दस्तावेज और विभाग के निष्कर्ष की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग की लिखित जांच रिपोर्ट सामने आना महत्वपूर्ण है। उसी से स्पष्ट होगा कि जांच औपचारिक थी या निर्धारित मानकों के अनुरूप पूरी की गई।

मरीज बीच में—कार्रवाई और राहत दोनों में पारदर्शिता जरूरी

पूरे विवाद में सबसे अहम पक्ष मरीज हैं। निजी अस्पताल पर अचानक कार्रवाई होती है तो वहां भर्ती मरीज और उनके परिजन प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर गंभीर कमियां दूर किए बिना अस्पताल को दोबारा संचालन की अनुमति मिलती है तो मरीजों की सुरक्षा से समझौते का जोखिम पैदा होता है। इसीलिए कार्रवाई जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका आधार सार्वजनिक और स्पष्ट होना है। अस्पताल क्यों बंद किया गया, कौन-कौन सी कमियां मिलीं, सुधार के लिए क्या निर्देश दिए गए, दोबारा निरीक्षण कब हुआ और संचालन की अनुमति किन शर्तों पर दी गई—इन तथ्यों को सामने रखने से ही राजनीतिक दबाव अथवा पक्षपात के आरोपों का जवाब मिल सकता है।

सांसद की एंट्री से मामला गरमाया, बोले—कलेक्टर और स्वास्थ्य मंत्री से करूंगा चर्चा

मामले में सांसद ज्ञानेश्वर पाटील की प्रतिक्रिया के बाद विवाद ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। सांसद ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि अनियमितताओं के कारण अस्पताल बंद किए जाते हैं और जांच के बाद दोबारा शुरू कर दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि अस्पताल दोषी है तो अस्पताल के खिलाफ और यदि अधिकारी दोषी हैं तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सांसद ने यह भी कहा कि अस्पतालों को नोटिस देने और बाद में अनुमति दिए जाने की प्रक्रिया को लेकर लेन-देन के आरोप उनके संज्ञान में आए हैं। ये फिलहाल आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। सांसद के अनुसार वे पूरे मामले को लेकर कलेक्टर और स्वास्थ्य मंत्री से चर्चा करेंगे।

CMHO के फोन नहीं उठाने की शिकायत भी सांसद तक

विवाद केवल अस्पतालों की कार्रवाई तक सीमित नहीं है। सांसद ज्ञानेश्वर पाटील ने सीएमएचओ डॉ. राजेंद्र कुमार वर्मा के फोन नहीं उठाने संबंधी शिकायतों पर भी नाराजगी जताई। सांसद के मुताबिक आमजन और जनप्रतिनिधियों से ऐसी शिकायतें लंबे समय से मिल रही हैं और वे स्वयं भी इस संबंध में कलेक्टर को अवगत करा चुके हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन से जुड़े अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह आमजन और जनप्रतिनिधियों की बात सुने तथा शिकायतों का निराकरण करे। सांसद ने इस कार्यप्रणाली में सुधार की जरूरत बताई।

अब विभाग के सामने ये सवाल

अब स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से स्पष्टता की अपेक्षा है—अस्पतालों को सील या बंद करने के आदेश किन कमियों के आधार पर दिए गए, बाद में संचालन की अनुमति देने से पहले उन कमियों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ, आयुष्मान संबंधी आरोपों की जांच कहां तक पहुंची और जिन अस्पतालों पर कार्रवाई हुई उनमें जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आगे क्या वैधानिक कदम उठाए गए? निजी अस्पताल सीधे मरीजों की जान और स्वास्थ्य से जुड़े हैं। इसलिए यहां कार्रवाई भी केवल दिखावटी नहीं हो सकती और राहत भी अपारदर्शी नहीं होनी चाहिए। अब निगाह इस बात पर है कि सांसद द्वारा मामला उठाए जाने के बाद प्रशासन पूरी प्रक्रिया और जांच रिपोर्ट स्पष्ट करता है या अस्पतालों पर कार्रवाई और फिर राहत का सिलसिला नए सवाल पैदा करता रहेगा।

ये भी पढ़े- ग्लोबल हॉस्पिटल की जांच महज 10 मिनट में निपटी: 4 मरीज भर्ती, डॉक्टर नदारद; आईसीयू भी नहीं, राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों से स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

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