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रासायनिक खेती से बाहर निकल रहे किसान: बुरहानपुर में 20 क्लस्टरों के जरिए प्राकृतिक खेती की बड़ी मुहिम

- खेत-खेत पहुंचकर सिखाई जा रही जीवामृत-बीजामृत की तकनीक, गुरुवार के प्राकृतिक हाट बाजार से किसानों को मिल रहा सीधा बाजार

बुरहानपुर। बदलते दौर में खेती की बढ़ती लागत, मिट्टी की घटती ताकत और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच बुरहानपुर जिले में अब खेती की तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो चुकी है। कृषक कल्याण वर्ष के तहत जिले में प्राकृतिक खेती को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग ने जिले में 20 क्लस्टर बनाकर एक ऐसी मुहिम छेड़ी है, जिसका मकसद किसानों को कम लागत, सुरक्षित उत्पादन और टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ाना है।

Sadaiv News
बुरहानपुर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, 20 क्लस्टरों के जरिए किसानों को प्रशिक्षण

अब विभागीय अधिकारी सिर्फ दफ्तरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खेत-खेत पहुंचकर किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। किसानों को मौके पर ही बताया जा रहा है कि कैसे वे अपने खेत पर उपलब्ध संसाधनों से खेती की लागत घटाकर बेहतर उत्पादन ले सकते हैं। यही वजह है कि यह पहल अब सिर्फ योजना नहीं, बल्कि खेती में बदलाव की ठोस जमीन तैयार करती नजर आ रही है।

उपसंचालक कृषि एम.एस. देवके ने बताया कि विभाग द्वारा गठित क्लस्टरों के माध्यम से गांव-गांव प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजर अनिल रावत फील्ड स्तर पर किसानों को प्राकृतिक खेती के हर महत्वपूर्ण पहलू की जानकारी दे रहे हैं। किसानों को जीवामृत, बीजामृत और घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक घोल तैयार करने की विधि समझाई जा रही है, ताकि वे रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम कर सकें। इसके साथ ही फसलों को जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने, कीट नियंत्रण करने और फसल सुरक्षा के प्राकृतिक उपाय भी किसानों को बताए जा रहे हैं। विभाग का फोकस साफ है खेती को कम खर्चीला, सुरक्षित और ज्यादा टिकाऊ बनाना।

मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी

श्री देवके ने बताया प्राकृतिक खेती को केवल उत्पादन का तरीका नहीं, बल्कि मिट्टी बचाने की रणनीति माना जा रहा है। लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की सेहत कमजोर होती जा रही है। ऐसे में प्राकृतिक खेती से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, उसकी जैविक सक्रियता बढ़ाने और उत्पादन क्षमता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलती है। इस पद्धति में केंचुए जैसे लाभकारी जीव सुरक्षित रहते हैं, जिन्हें किसान का मित्र कहा जाता है। वहीं लेडीबग, लेसविंग, परजीवी ततैया, ग्राउंड बीटल और हॉवरफ्लाई जैसे लाभकारी कीट खेत में मौजूद हानिकारक कीटों को नियंत्रित कर फसलों की रक्षा करते हैं। यानी प्राकृतिक खेती सिर्फ खेत नहीं बचाती, बल्कि पूरे कृषि तंत्र को संतुलित रखती है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड से किसानों को मिल रही सही दिशा

विभाग प्राकृतिक खेती के साथ-साथ किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के प्रति भी जागरूक कर रहा है। यह योजना किसानों को उनकी मिट्टी की वास्तविक स्थिति समझने का वैज्ञानिक आधार देती है। मिट्टी परीक्षण के जरिए यह जानकारी मिलती है कि खेत में कौन-कौन से पोषक तत्व हैं, किसकी कमी है और किस फसल के लिए कौन सा प्रबंधन जरूरी है। हर 2 से 3 वर्ष में मिट्टी परीक्षण कराने से किसानों को अनावश्यक उर्वरक खर्च से राहत मिलती है और उत्पादन बढ़ाने में भी मदद मिलती है। इससे किसान अंदाजे से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर खेती कर सकते हैं।

गुरुवार का ‘प्राकृतिक हाट बाजार’ बना किसानों की ताकत

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ जिले में इसके उत्पादों के बाजार की भी व्यवस्था की गई है। कृषि उपज मंडी शनवारा में प्रत्येक गुरुवार को ‘प्राकृतिक हाट बाजार’ लगाया जा रहा है, जहां किसान अपनी प्राकृतिक और जैविक उपज सीधे उपभोक्ताओं को बेच रहे हैं। इस बाजार में फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद बिना किसी बिचौलिये के सीधे ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं।

कम लागत, सुरक्षित फसल और बेहतर भविष्य

प्राकृतिक खेती से तैयार अनाज, दालें, फल और सब्जियां अधिक पौष्टिक और सुरक्षित मानी जाती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि किसान इन्हें अपने खेत पर ही कम लागत में तैयार कर सकते हैं। इससे खेती का खर्च कम होता है और मुनाफा बढ़ने की संभावना भी बनती है। विभाग किसानों से लगातार अपील कर रहा है कि वे अधिक से अधिक संख्या में प्राकृतिक खेती अपनाएं।

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