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प्लॉट के नाम पर ठगी: दो कॉलोनाइजरों पर धोखाधड़ी मामले में एफआईआर दर्ज

- एसडीएम के निर्देश पर बड़ी कार्रवाई, बिना मंजूरी प्लॉट बेचकर ठगे नागरिक; पहले भी 7 पर केस, 3 को सजा

बुरहानपुर। जिले में अवैध कॉलोनियां काटकर लोगों से धोखाधड़ी करने वाले कॉलोनाइजरों पर अब प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। एसडीएम के निर्देश पर निंबोला थाना पुलिस ने दो कॉलोनाइजरों के खिलाफ ग्राम स्वराज अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की है।

निम्बोला थाना प्रभारी राहुल कांबले के अनुसार तहसीलदार प्रवीण ओहरिया की शिकायत पर पांच पुल क्षेत्र में रहने वाले अब्दुल मलिक और मुजम्मिल अहमद के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया। आरोप है कि दोनों ने बिना वैध अनुमति अवैध कॉलोनी विकसित कर लोगों को प्लॉट बेच दिए, जबकि मौके पर सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराईं। साथ ही कॉलोनी का ले-आउट भी टीएनसीपी से स्वीकृत नहीं कराया गया था।
फिलहाल गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन पुलिस ने जल्द आरोपियों को गिरफ्तार करने की बात कही है।

पहले भी हुई कार्रवाई, 7 कॉलोनाइजरों पर केस

अवैध कॉलोनियों के खिलाफ यह पहली कार्रवाई नहीं है। फरवरी माह में भी प्रशासन ने दो कॉलोनियों के 7 कॉलोनाइजरों के खिलाफ लालबाग थाने में एफआईआर दर्ज की थी। इनमें संदेश महेश्वरी सहित शफीउल्ला, एहसान उल्ला, सरफराज, इरफान, शेख जावेद और नुसरत खान को आरोपी बनाया गया था। जांच में सामने आया था कि बिना अनुमति कृषि और डायवर्सन भूमि पर प्लॉट काटकर बेचे गए, जिससे खरीदारों को भारी परेशानी उठानी पड़ी।

60 कॉलोनाइजर प्रशासन के रडार पर

सूत्रों के मुताबिक एसडीएम कोर्ट में 19 अवैध कॉलोनियों के करीब 60 कॉलोनाइजरों के खिलाफ प्रकरण चल रहे हैं। अब तक 4 कॉलोनियों के 12 कॉलोनाइजरों पर केस दर्ज हो चुका है। इन कॉलोनाइजरों ने प्लॉट खरीददारों से सड़क, पानी, बिजली जैसी सुविधाओं का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत में कुछ भी नहीं मिला। नतीजा—लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए भटक रहे हैं।

पहली बार 3 कॉलोनाइजरों को जेल

अवैध कालोनी बसाने के मामले में पहली बार जिले के तीन कालोनाइजरों मोहम्मद हारून, मोहम्मद सादिक और मोहम्मद जाहिर को न्यायालय इसी माह दो-दो साल के कारावास की सजा सुनाई है। आरोपितों ने लोधीपुरा में ताज नगर के नाम से एक कालोनी काटी थी। इसमें अब्दुल मलिक सहित अन्य लोगों ने भी प्लाट बुक किया था। उसने वर्ष 2013 से 2016 तक मासिक किश्तों के रूप में कालोनाइजरों के पास 1.25 लाख रुपये जमा कराए थे। जब प्लाट की रजिस्ट्री की बारी आई तो उसे पता चला कि न तो कालोनी का ले-आउट स्वीकृत है और न ही डायवर्शन है। कालोनाइजरों ने उसके रुपये भी वापस नहीं दिए था। जिसके चलते प्रशासन ने एफआईआर दर्ज कराई थी।

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