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सलई-धावड़ा गोंद पर तत्काल प्रतिबंध, हाईकोर्ट के आदेश के बाद वन विभाग सख्त

- डीएफओ ने जारी किए आदेश, पिछले दिनों जबलपुर हाईकोर्ट में दो लोगों ने लगाई थी जनहित याचिका

  •  अवैज्ञानिक तरीके से पेड़ों से निकाला जा रहा था गोंद

बुरहानपुर। मुनाफे की अंधी दौड़ में जंगलों की सांसें छीनी जा रही थीं। सलई और धावड़ा के पेड़ों पर गहरे चीरे लगाकर गोंद निकाला जा रहा था—न नियम, न वैज्ञानिक तरीका। नतीजा, पेड़ों के सूखने का खतरा और जैव विविधता पर सीधा हमला। मामला जब अदालत पहुंचा तो सख्ती आई। अब पूरे बुरहानपुर वनमंडल में सलई, धावड़ा समेत छह तरह के गोंद के संग्रहण और परिवहन पर फिर से कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया है।

यह कार्रवाई मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के 11 फरवरी 2026 के आदेश के बाद हुई। डब्ल्यू.पी. 49592/2025 में कोर्ट ने साफ कहा—14 फरवरी 2024 के प्रतिबंध आदेश का कड़ाई से पालन हो।

जनहित याचिका से खुली पोल

बुरहानपुर के पर्यावरणप्रेमी जितेंद्र रावतोले और जंबूपानी के शौकत अली ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि संग्रहणकर्ता ज्यादा मुनाफे के लालच में पेड़ों पर अवैज्ञानिक तरीके से बार-बार गहरे घाव कर रहे हैं। इससे सलई और धावड़ा के वृक्ष तेजी से कमजोर हो रहे हैं। कोर्ट ने मप्र सरकार के प्रमुख सचिव, जिला प्रशासन और वन विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। साथ ही स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रतिबंध का सख्ती से अनुपालन कराया जाए।

जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने संभागीय वन अधिकारी की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 89% सलाई वृक्ष क्षतिग्रस्त पाए गए, 73% धावड़ा वृक्ष प्रभावित हुए, गोंद निकालने में कृत्रिम रसायनों का उपयोग किया गया। अवैज्ञानिक तरीके से अधिक मात्रा में विदोहन हुआ। रिपोर्ट में कहा गया कि इस प्रकार की गतिविधियों से सलाई और धावड़ा वृक्षों के पुनरुत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे दीर्घकालीन जैव विविधता संकट की आशंका है।

2024 में भी लगा था प्रतिबंध, फिर क्यों नहीं रुका खेल?

वनमंडलाधिकारी कार्यालय के आदेश क्रमांक 297, दिनांक 14.02.2024 से पूरे वनमंडल क्षेत्र के आरक्षित और संरक्षित वनों में सलई, धावड़ा, बबूल, कुल्लू, पलाश और खैर गोंद के संग्रहण को निषिद्ध घोषित किया गया था। इसके बावजूद जंगलों में गुपचुप तरीके से गोंद निकासी जारी रही। वन विभाग के सूत्र बताते हैं कि अधिक मात्रा में गोंद निकालने की होड़ में पेड़ों को गहरे-गहरे काटा गया, जिससे उनके पुनरुत्पादन की क्षमता प्रभावित हुई। कई स्थानों पर पेड़ों के सूखने की स्थिति बन गई।

डीएफओ का कड़ा फरमान

बुरहानपुर डीएफओ विद्याभूषण सिंह ने म.प्र. वन उपज (जैव विविधता का संरक्षण और पोषणीय कटाई) नियम 2005 के उपबंध-5 के तहत 13 फरवरी 2026 से आगामी आदेश तक पूरे वनमंडल क्षेत्र को निषिद्ध घोषित किया है। अब यदि कोई व्यक्ति गोंद का संग्रहण या निष्कर्षण करते पाया गया तो उसके खिलाफ भारतीय वन अधिनियम 1927 और जैव विविधता अधिनियम 2002 के तहत कड़ी कार्रवाई होगी। अपराध में प्रयुक्त औजार, वाहन और अन्य सामग्री जब्त की जाएगी।

वन विभाग ने सभी लाइसेंस तत्काल निरस्त करते हुए आदेश की प्रतियां सार्वजनिक स्थलों पर चस्पा कर दी हैं। अधिकारियों का कहना है कि अब निगरानी और सख्त की जाएगी।

सवाल कई, जवाब इंतजार में
  • 2024 का प्रतिबंध होने के बावजूद अवैज्ञानिक निकासी कैसे चलती रही?
  • क्या जमीनी स्तर पर निगरानी कमजोर थी?
  • क्या स्थानीय नेटवर्क की मिलीभगत से जंगलों को नुकसान पहुंचा?

फिलहाल आदेश जारी हो चुका है। कागजों में सख्ती दिख रही है। अब असली परीक्षा मैदान में है—क्या वन विभाग लगातार निगरानी कर पाएगा या फिर ‘गोंद का खेल’ फिर किसी और मोड़ से शुरू होगा? जंगलों को राहत मिली है, लेकिन यह राहत स्थायी होगी या अस्थायी—यह आने वाला समय तय करेगा।

ये भी पढ़े- गोंद के नाम पर जंगलों की नीलामी? कोर्ट ने वन विभाग के प्रमुख सचिव, कलेक्टर, एसपी, सीसीएफ को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

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