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केले के रेशे से बनी प्राकृतिक राखियां दे रहीं महिलाओं को आत्मनिर्भरता की नई पहचान, विधायक अर्चना चिटनिस ने की ‘लोकल’ अपनाने की अपील

- कभी कचरा समझकर फेंके जाते थे केले के तने, अब वही बन रहे महिलाओं की कमाई का जरिया; 40 से अधिक परिवारों की जिंदगी में आई नई उम्मीद

बुरहानपुर। यह सिर्फ एक राखी की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलाव की कहानी है जिसने खेतों में बेकार समझे जाने वाले केले के तनों को महिलाओं की आजीविका में बदल दिया। देशभर में केले के उत्पादन के लिए पहचान रखने वाला बुरहानपुर अब केले के रेशे (फाइबर) से बने मूल्यवर्धित उत्पादों के जरिए महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया मॉडल बनकर उभर रहा है। रक्षाबंधन के इस सीजन में महिलाओं के हाथों से तैयार प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल राखियां न केवल बाजार में अपनी अलग पहचान बना रही हैं, बल्कि यह साबित भी कर रही हैं कि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग गांवों की अर्थव्यवस्था बदल सकता है।

Sadaiv News
विधायक अर्चना चिटनिस ने महिलाओं के इस नवाचार की सराहना करते हुए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की।

यह पहल ‘एक जिला-एक उत्पाद’ (ODOP) योजना के तहत शुरू हुई, लेकिन अब यह केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बुरहानपुर की नई पहचान बनती जा रही है।

जहां लोग कचरा देखते थे, वहां महिलाओं ने देखा रोजगार

केले की खेती के बाद खेतों में बचने वाले तनों को पहले बेकार मानकर फेंक दिया जाता था। इन्हीं तनों से निकलने वाले रेशे को आज महिला स्व-सहायता समूह सुंदर और उपयोगी उत्पादों में बदल रहे हैं। श्रीकृष्ण स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने छोटे स्तर से शुरुआत की और आज यह प्रयास 40 से अधिक महिलाओं के लिए स्थायी आय का माध्यम बन चुका है। समूह की सदस्य पूजा कुशवाह बताती हैं कि लगातार प्रशिक्षण, मेहनत और नवाचार के बल पर अब केले के रेशे से केवल राखियां ही नहीं, बल्कि झूले, मोबाइल कवर, झूमर, पेन होल्डर, भगवान गणेश की प्रतिमाएं और अन्य सजावटी उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं।

प्राकृतिक राखियां बनीं पहली पसंद

शाहपुर की उषा उदलकर बताती हैं कि उनके समूह द्वारा तैयार की जा रही राखियां पूरी तरह प्राकृतिक, हस्तनिर्मित और पर्यावरण-अनुकूल हैं। इनमें प्लास्टिक, सिंथेटिक धागे या रासायनिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता। यही वजह है कि इस बार बाजार में इन राखियों की मांग तेजी से बढ़ रही है। महज 15 से 25 रुपए की कीमत वाली ये राखियां न केवल हर परिवार की पहुंच में हैं, बल्कि हर खरीद सीधे किसी ग्रामीण महिला की आय से भी जुड़ती है।

अर्चना चिटनिस ने बढ़ाया महिलाओं का हौसला

विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अर्चना चिटनिस से जब ग्राम जैनाबाद की पूजा कुशवाह और शाहपुर की उषा उदलकर ने मुलाकात कर उन्हें केले के रेशे से बनी राखियां भेंट कीं, तो उन्होंने महिलाओं के इस प्रयास को बुरहानपुर की नई आर्थिक पहचान बताया। उन्होंने कहा कि बुरहानपुर का केला अब केवल खेती तक सीमित नहीं है। इसके रेशे से तैयार होने वाले उत्पाद किसानों, महिलाओं और स्थानीय उद्यमिता को जोड़ते हुए नई आर्थिक श्रृंखला तैयार कर रहे हैं। इससे कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

‘वोकल फॉर लोकल’ को मिल रही नई ताकत

अर्चना चिटनिस ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “वोकल फॉर लोकल” और “लोकल फॉर ग्लोबल” का मंत्र तभी सफल होगा, जब स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता मिलेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश सरकार महिला स्व-सहायता समूहों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है और बुरहानपुर की महिलाएं इस दिशा में प्रेरणादायी उदाहरण बन रही हैं।

राखी में संस्कृति भी, पर्यावरण भी

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में केले के वृक्ष का विशेष धार्मिक महत्व है। पूजा-अर्चना और शुभ कार्यों में केले के वृक्ष का उपयोग समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में केले के रेशे से बनी राखियां केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, प्रकृति संरक्षण और स्वदेशी भावना का संदेश भी देती हैं। उन्होंने महाभारत का प्रसंग याद करते हुए कहा कि द्रौपदी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की उंगली पर बांधा गया रक्षा सूत्र प्रेम, विश्वास और संरक्षण का प्रतीक था। आज वही भावना इन प्राकृतिक राखियों के माध्यम से समाज तक पहुंच रही है।

हर राखी से जुड़ेगा एक परिवार

अर्चना चिटनिस ने नागरिकों से अपील की कि इस रक्षाबंधन पर अधिक से अधिक लोग स्थानीय महिलाओं द्वारा बनाई गई केले के रेशे की राखियां खरीदें। उनका कहना था कि हर खरीदी गई राखी केवल भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत नहीं करेगी, बल्कि किसी महिला के आत्मसम्मान, उसके परिवार की खुशहाली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी।

सदैव विश्लेषण

बुरहानपुर की यह पहल केवल राखियां बनाने तक सीमित नहीं है। यदि केले के रेशे से बनने वाले उत्पादों को राष्ट्रीय बाजार, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बेहतर ब्रांडिंग मिले तो यह मॉडल जिले की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है। एक ओर किसानों को केले के अवशेषों का मूल्य मिलेगा, दूसरी ओर महिलाओं को स्थायी रोजगार और स्थानीय उद्योग को नई दिशा। यह पहल वास्तव में “वेस्ट टू वेल्थ” और “महिला सशक्तिकरण” का सफल मॉडल बन सकती है।

एक नजर में
  • 40+ महिलाओं को मिला रोजगार
  • केले के रेशे से बन रहीं पर्यावरण-अनुकूल राखियां
  • ₹15 से ₹25 तक कीमत, लगातार बढ़ रही मांग
  • ODOP योजना के तहत मिला नया बाजार
  • ‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बुरहानपुर का प्रेरक मॉडल
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