बुरहानपुर। अदालतों में चल रही अंग्रेज़ी की कार्यवाही अब सवालों के घेरे में है। खंडवा लोकसभा क्षेत्र के सांसद ज्ञानेश्वर पाटील ने मंगलवार को लोकसभा में नियम 377 के तहत एक ऐसा मुद्दा उठाया, जिसने सीधे न्याय व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया। उन्होंने उच्च न्यायालयों में हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने की मांग करते हुए कहा कि भाषा की दीवार न्याय को आम आदमी से दूर कर रही है।
सांसद पाटील ने कहा कि आज भी देश के अधिकांश उच्च न्यायालयों और कई जिला न्यायालयों में कार्यवाही अंग्रेज़ी में होती है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण, गरीब, किसान और सामान्य वर्ग को उठाना पड़ता है। वे अपने ही केस की कार्यवाही और फैसलों को समझ नहीं पाते। उन्होंने साफ कहा जिसे अपनी ही सुनवाई समझ न आए, उसे न्याय कैसे मिलेगा?
भाषा की बाधा बन रही अन्याय की वजह
सांसद श्री पाटील ने कहा कि न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं, बल्कि उसे समझने का अधिकार भी है। जब व्यक्ति भाषा नहीं समझता, तो वह वकीलों या अन्य लोगों पर निर्भर हो जाता है इससे पारदर्शिता कम होती है और भ्रम की स्थिति बनती है यह स्थिति न्याय व्यवस्था में विश्वास को भी कमजोर करती है।
कानून में रास्ता मौजूद, अमल की कमी
सांसद ने अपने तर्क को संवैधानिक आधार देते हुए कहा संविधान का अनुच्छेद 348(2), राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 7 इनमें उच्च न्यायालयों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग का प्रावधान पहले से मौजूद है। जरूरत सिर्फ इसे सख्ती और प्रभावी तरीके से लागू करने की है।
मांग: हिंदी बने न्यायालयों की अनिवार्य भाषा
सांसद पाटील ने केंद्र सरकार से मांग की मध्यप्रदेश सहित सभी हिंदी भाषी राज्यों में हाईकोर्ट की कार्यवाही हिंदी में हो, फैसले और आदेश भी हिंदी में जारी किए जाएं। उन्होंने कहा कि इससे आमजन को न्याय प्रक्रिया समझने में आसानी होगी। न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही लोगों का विश्वास मजबूत होगा।
मोदी सरकार से उम्मीद, निर्णय का इंतजार
सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का मूल मंत्र तभी सार्थक होगा, जब न्याय भी सभी की भाषा में उपलब्ध होगा। उन्होंने केंद्र से इस मुद्दे पर जल्द ठोस और सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की।