बुरहानपुर। सरकारी पट्टे की जमीन पहले वारिसों के नाम पहुंची, फिर उसका विक्रय हुआ। रजिस्ट्री के बाद नामांतरण भी होते रहे और करीब दो दशक तक राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलते गए। लेकिन जब जमीन के मूल सरकारी पट्टे की शर्तों की पड़ताल हुई तो पूरा मामला पलट गया। नेपानगर तहसील के ग्राम डवालीखुर्द की खसरा नंबर 61, रकबा 2.02 हेक्टेयर जमीन के मामले में कलेक्टर न्यायालय ने सख्त फैसला सुनाते हुए वर्तमान दर्ज भूमिस्वामी को बेदखल करने और जमीन का तत्काल कब्जा लेकर मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज करने के आदेश दिए हैं। कलेक्टर कोर्ट के आदेश का सबसे अहम आधार यह रहा कि जमीन मूल रूप से सरकारी पट्टे पर दी गई थी और इसके हस्तांतरण से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति लिए जाने का प्रमाण रिकॉर्ड में नहीं मिला। यानी वर्षों तक हुई रजिस्ट्री और नामांतरण की प्रक्रिया के बावजूद जमीन के पहले हस्तांतरण में हुई चूक आखिरकार पूरे सौदे पर भारी पड़ गई। उक्त प्रकरण में पैरवी अधिवक्ता निखिल खंडेलवाल ने की।
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1985-86 से शुरू होती है जमीन की कहानी
दरअसल मामला राजस्व प्रकरण क्रमांक 90 बी/121/2025-26 का है। शोएब पिता शब्बीर, निवासी रसूलपुरा ने आवेदन देकर इस जमीन के संबंध में कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद राजस्व रिकॉर्ड खंगाला गया। कलेक्टर न्यायालय के आदेश के मुताबिक वर्ष 1985-86 के मिसल बंदोबस्त में खसरा नंबर 61 की 2.02 हेक्टेयर जमीन गोट्या पिता भावडू, निवासी अम्बाड़ा के नाम सरकारी पट्टेदार के रूप में दर्ज थी। वर्ष 1991-92 में रिकॉर्ड में गोट्या पिता भावडू का नाम भूमिस्वामी के रूप में आया। उनकी मृत्यु के बाद वर्ष 1993-94 में वारसान के आधार पर अयोध्या पिता गोट्या और गोपीबाई पुत्री गोट्या के नाम दर्ज किए गए। यहीं से बाद के जमीन सौदे की कहानी शुरू हुई।
2004 में हुआ विक्रय, यहीं फंसा मामला
अधिवक्ता निखिल खंडेलवाल ने बताया- आदेश के अनुसार पट्टेदार के वारिस अयोध्या और गोपीबाई ने जमीन शिवराम पिता चिमा, निवासी अम्बाड़ा को बेच दी। वर्ष 2003-04 के रिकॉर्ड में संशोधित नामांतरण के आधार पर शिवराम का नाम दर्ज हुआ। लेकिन जब कलेक्टर कोर्ट में पुराने रिकॉर्ड और जमीन की प्रकृति की जांच हुई तो सवाल उठा—सरकारी पट्टे की जमीन बेचने से पहले सक्षम अधिकारी से अनुमति ली गई थी या नहीं? नायब तहसीलदार वृत्त सारोला और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), नेपानगर की जांच में ऐसी अनुमति का कोई दस्तावेज सामने नहीं आया। कलेक्टर न्यायालय ने इसी बिंदु को निर्णायक माना।
रजिस्ट्री हुई, नामांतरण हुए… पर मूल सौदे की वैधानिकता पर सवाल
इसके बाद जमीन विभिन्न राजस्व प्रविष्टियों से गुजरती हुई वर्ष 2021-22 में शिवम पिता नरेंद्र कुमार के नाम दर्ज हुई। आदेश के अनुसार नामांतरण राजस्व प्रकरण के आधार पर किया गया था और वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक रिकॉर्ड में शिवम का नाम चला आ रहा था। भूमि पर बैंक बंधक की प्रविष्टियां होने का उल्लेख भी आदेश में है। इसके बावजूद कलेक्टर कोर्ट ने साफ किया कि मूल सरकारी पट्टे की जमीन के हस्तांतरण में यदि आवश्यक अनुमति ही नहीं ली गई तो बाद की राजस्व प्रविष्टियां मूल उल्लंघन के सवाल को समाप्त नहीं करतीं।
वर्तमान भूमिस्वामी का तर्क—रजिस्टर्ड विक्रय पत्र से खरीदी थी जमीन
सुनवाई के दौरान वर्तमान दर्ज भूमिस्वामी की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। तर्क दिया गया कि वर्ष 2004 में भूमि का विक्रय रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से हुआ और उसके बाद समय-समय पर पंजीकृत विक्रय पत्रों एवं नामांतरण आदेशों के आधार पर स्वामित्व की स्थिति बदलती रही। यह भी कहा गया कि विवादित भूमि का किसी स्तर पर गैर अनुसूचित जनजाति व्यक्ति को अंतरण नहीं हुआ तथा मूल धारक से वर्तमान अनावेदक तक पक्ष अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं। लेकिन यह तर्क जमीन के मूल पट्टे से जुड़े सवाल को खत्म नहीं कर सका।
कलेक्टर कोर्ट का सवाल सीधा—अनुमति कहां है?
कलेक्टर न्यायालय ने दस्तावेजों और राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद पाया कि जमीन वर्ष 1985-86 में सरकारी पट्टेदार के रूप में दर्ज थी। आदेश में मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 165(7)(ख) का उल्लेख करते हुए कहा गया कि ऐसी पट्टे की भूमि अहस्तांतरणीय है और सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना उसका विक्रय नहीं किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि पट्टेदार के वारिसों द्वारा जमीन बेचने से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति लिए जाने का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका। कलेक्टर कोर्ट ने इसे भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन माना।
अब जमीन से बेदखली, सरकार लेगी कब्जा
करीब दो दशक से अलग-अलग नामों से राजस्व रिकॉर्ड में चली आ रही जमीन पर अब कलेक्टर कोर्ट का आदेश भारी पड़ा है। मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता-1959 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई का पर्याप्त आधार मानते हुए कलेक्टर ने खसरा नंबर 61, रकबा 2.02 हेक्टेयर जमीन से वर्तमान दर्ज भूमिस्वामी शिवम पिता नरेंद्र कुमार को बेदखल करने के आदेश दिए हैं। साथ ही नायब तहसीलदार वृत्त सारोला और तहसीलदार नेपानगर को तत्काल जमीन का कब्जा प्राप्त करने तथा राजस्व अभिलेख में भूमि को मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
बड़ा सवाल—इतने साल नामांतरण होते रहे तो मूल पट्टे की शर्त क्यों नहीं पकड़ी गई?
कलेक्टर कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला सिर्फ एक जमीन के सौदे तक सीमित नहीं रह जाता। रिकॉर्ड बताता है कि जमीन अलग-अलग वर्षों में नामांतरण की प्रक्रिया से गुजरती रही। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जमीन मूल रूप से सरकारी पट्टे की थी तो बाद की राजस्व प्रक्रियाओं के दौरान उसके हस्तांतरण के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति की जांच किस स्तर पर हुई? फिलहाल कलेक्टर कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट कर दी है—रजिस्ट्री और नामांतरण की लंबी श्रृंखला के बावजूद सरकारी पट्टे की मूल शर्तों की अनदेखी जमीन के हस्तांतरण को नहीं बचा सकी।
40 साल का रिकॉर्ड, ऐसे बदले जमीन के नाम
- 1985-86: गोट्या पिता भावडू के नाम सरकारी पट्टेदार के रूप में दर्ज
- 1991-92: गोट्या का नाम भूमिस्वामी के रूप में दर्ज
- 1993-94: मृत्यु के बाद अयोध्या पिता गोट्या व गोपीबाई पुत्री गोट्या के नाम वारसान
- 2003-04: विक्रय के बाद शिवराम पिता चिमा का नाम दर्ज
- 2021-22: शिवम पिता नरेंद्र कुमार के नाम नामांतरण
- 2025-26: मामला कलेक्टर न्यायालय पहुंचा
आदेश: वर्तमान दर्ज भूमिस्वामी को बेदखल कर 2.02 हेक्टेयर भूमि का कब्जा लेने और मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज करने के निर्देश
फैसले का सबसे बड़ा संदेश
सरकारी पट्टे की जमीन में सिर्फ रजिस्ट्री करा लेना या राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण हो जाना पर्याप्त नहीं है। यदि मूल पट्टे के तहत हस्तांतरण के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति जरूरी थी और वह नहीं ली गई, तो वर्षों बाद भी पूरा सौदा जांच और कार्रवाई के दायरे में आ सकता है।



