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रेशम उद्योग ठप— रेशम के नाम पर सरकारी खेल, उत्पादन कम; वेतन ज्यादा

— करोड़ों की लागत से बना रेशम केंद्र की हकीकत- कागजों में योजना, जमीन पर वीरानी

  •  उत्पादन टके का, खर्च लाखों का; 33 एकड़ जमीन पड़ी बंजर

बुरहानपुर। शाहपुर रोड पर कभी ‘रेशम क्रांति’ का सपना दिखाकर जिस रेशम केंद्र को करोड़ों रुपये की लागत से खड़ा किया गया था, वही आज बदहाली की तस्वीर बन चुका है। यह केंद्र न किसानों को जोड़ पाया, न उत्पादन बढ़ा पाया। उल्टा कर्मचारियों की सैलरी और रखरखाव का बोझ सरकार पर पड़ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि सालभर का उत्पादन कर्मचारियों के वेतन से भी कम पड़ रहा है, जबकि 33 एकड़ सरकारी जमीन पूरी तरह खाली पड़ी है।

Sadaiv Newsगौरतलब है कि रेशम केंद्र में फिलहाल तीन कर्मचारी तैनात हैं—एक अस्थायी और दो स्थायी। स्थायी कर्मचारी राधेश्याम मालवीय खुद स्वीकार करते हैं कि पूरे साल में मुश्किल से 7–8 क्विंटल कोकून ही निकल पाता है। पिछली बार यह कोकून मात्र 565 रुपये प्रति किलो के भाव बिका। हैरानी की बात यह कि इसे बेचने के लिए कर्मचारी महाराष्ट्र के जालना तक गए। यानी बेचने का खर्च अलग, वेतन अलग और रखरखाव अलग — लेकिन उत्पादन टके भर का। साफ है कि यह केंद्र आत्मनिर्भर तो दूर, घाटे का सौदा बन चुका है।

33 एकड़ जमीन—पूरी तरह बंजर

रेशम केंद्र के नाम पर 33 एकड़ उपजाऊ जमीन है, लेकिन उस पर शहतूत का व्यवस्थित प्लांटेशन तक नहीं दिखता। अफसरों की उदासीनता के कारण खेत पूरी तरह खाली पड़ा है। न सिंचाई, न खेती, न योजना — बस सरकारी फाइलों में ‘संभावनाओं’ की कहानी। कर्मचारियों का बहाना है- पानी की कमी, मौसम अनुकूल नहीं, मजदूर नहीं मिलते, किसान जुड़ते नहीं। लेकिन असली सवाल यह है कि जब जमीन, बजट और विभाग है, तो जिम्मेदारी किसकी?

पूरे जिले में सिर्फ दो किसान जुड़े!

जिलेभर में किसानों को रेशम पालन से जोड़ने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन हकीकत यह है कि इस केंद्र से केवल दो किसान ही जुड़े हैं। इसका मतलब साफ है- प्रचार हुआ, फोटो खिंचे, तालियां बजीं, लेकिन जमीनी काम शून्य रहा।

कागजों पर योजनाएं, जमीन पर झूठ

दावा 1 — दो लाख की सहायता
घोषणा हुई थी कि निजी जमीन पर एक एकड़ मलबरी रेशम योजना लगाने वाले किसानों को 2 लाख रुपये आर्थिक सहायता मिलेगी। आज तक न किसी को पैसा मिला, न योजना धरातल पर उतरी।

दावा 2 — कोकून मंडी बनेगी
कर्नाटक की तर्ज पर बुरहानपुर में कोकून मंडी बनाने का वादा किया गया था। लेकिन आज हालत यह है कि यहां खरीददार तक नहीं हैं, इसलिए माल महाराष्ट्र भेजना पड़ रहा है।

दावा 3 — भोपाल से दौरे हुए, काम कुछ नहीं
एक बार भोपाल से रेशम उद्योग के बड़े अधिकारी आए, निरीक्षण किया, भाषण दिए और लौट गए — फिर सब ठंडे बस्ते में।

कलेक्टर का निरीक्षण भी बेअसर

करीब दो महीने पहले कलेक्टर हर्ष सिंह ने रेशम केंद्र का निरीक्षण किया था। उन्होंने शहतूत पौधों का जायजा लिया, कृमि पालन प्रक्रिया देखी। वैज्ञानिक तरीके से काम करने के निर्देश दिए। उत्पादन गुणवत्ता सुधारने की ताकीद की। कर्मचारियों ने तब दावा किया था कि पांच शिफ्टों में रेशम निकाला जाता है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि केंद्र आज भी बदहाल है और उत्पादन नगण्य।

रेशम उत्पादन में गिरावट आ रही

पानी और मौसम की वजह से रेशम उत्पादन में गिरावट आ रही है। रेशम केंद्र से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे है। हितग्राही को जोड़ने के लिए कार्यशाला आयोजित कर रहे है। कर्मचारियो की कमी है। – देवी सिंह राठौर, आपरेटिव, रेशम केंद्र बुरहानपुर

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