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करोड़ों के ‘मॉडल स्कूल’ की जमीनी हकीकत: बच्चों के हाथों में किताब नहीं, झाड़ू… लैब पर ताले, कक्षाएं बिना शिक्षक 

- शाहपुर के सांदीपनि विद्यालय की पड़ताल में खुली अव्यवस्थाओं की परतें; गंदगी, शिक्षक संकट और बंद प्रयोगशालाओं ने सरकारी दावों पर उठाए सवाल

बुरहानपुर। सरकारी स्कूलों में निजी विद्यालयों जैसी शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर सांदीपनि विद्यालय बनाए। आधुनिक लैब, स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और बेहतर शैक्षणिक वातावरण का सपना दिखाया गया, लेकिन बुरहानपुर जिले के शाहपुर स्थित सांदीपनि विद्यालय की जमीनी तस्वीर इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आई। यहां बच्चों के हाथों में किताबों की जगह झाड़ू थी, कई कक्षाएं शिक्षक विहीन मिलीं, आधुनिक प्रयोगशालाओं पर ताले लटके थे और परिसर में गंदगी फैली हुई थी। सबसे हैरानी की बात यह रही कि निरीक्षण के दौरान जिम्मेदार अधिकारी भी अपने कार्यालय में मौजूद नहीं मिले।

Sadaiv News
शाहपुर के सांदीपनि विद्यालय में ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान बच्चों से सफाई, बंद लैब और शिक्षक विहीन कक्षाएं सामने आईं।

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान सामने आए तथ्य केवल एक विद्यालय की बदहाली नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

जब कक्षा छोड़ बच्चों ने उठाई झाड़ू

विद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही सबसे चौंकाने वाला दृश्य सामने आया। तीसरी कक्षा के मासूम बच्चे परिसर और मैदान में झाड़ू लगाते दिखाई दिए। कोई बरामदे की सफाई कर रहा था तो कोई कचरा इकट्ठा कर रहा था। शिक्षिका आशा वानखेड़े ने बताया कि चपरासी सुबह 11:15 बजे तक नहीं आया था, इसलिए बच्चों से सफाई करवाई गई। जबकि विद्यालय में चार चपरासी पदस्थ हैं। ऐसे में यह सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है कि कर्मचारियों की अनुपस्थिति का बोझ विद्यार्थियों पर क्यों डाला गया?

1300 विद्यार्थियों के बीच शिक्षक संकट

करीब 1300 विद्यार्थियों वाले इस विद्यालय में 22 नियमित और 13 अतिथि शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन पड़ताल के दौरान पांचवीं कक्षा के दोनों सेक्शन बिना शिक्षक मिले। बच्चे कक्षा में बैठे शिक्षक का इंतजार कर रहे थे। कुछ देर बाद पहुंचे शिक्षकों ने बताया कि वे ई-अटेंडेंस दर्ज कराने गए थे। सवाल यह है कि यदि विद्यालय का समय शुरू हो चुका था, तो कक्षाओं में पढ़ाई छोड़कर शिक्षक उपस्थिति दर्ज कराने में क्यों व्यस्त थे?

करोड़ों की लैब पर जंग, डिजिटल शिक्षा कागजों तक

सांदीपनि विद्यालयों की पहचान आधुनिक सुविधाओं से होनी चाहिए, लेकिन शाहपुर विद्यालय में अधिकांश व्यवस्थाएं उपयोग के बजाय बंद मिलीं। एसटीइएम लैब धूल से अटी मिली। आईसीटी लैब पर ताला लटका मिला। आर्ट एंड क्राफ्ट कक्ष बंद मिला। कंप्यूटर और विज्ञान उपकरण धूल खाते नजर आए। जिन संसाधनों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, वे विद्यार्थियों के उपयोग में नहीं दिखे।

11वीं कॉमर्स में अंग्रेजी शिक्षक नहीं

कक्षा 11वीं कॉमर्स के विद्यार्थियों ने बताया कि अंग्रेजी विषय का पीरियड नियमित रूप से प्रभावित हो रहा है क्योंकि संबंधित अतिथि शिक्षक को अभी तक कार्यभार नहीं मिला है। इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।

कक्षा में पढ़ाई नहीं, मोबाइल पर व्यस्त मिले शिक्षक

निरीक्षण के दौरान कक्षा आठवीं में एक शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाने के बजाय मोबाइल फोन पर बातचीत करते मिले। पूछने पर उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे फोन पर बात कर रहे थे। शिक्षण समय में मोबाइल उपयोग पर प्रतिबंध के बावजूद यह लापरवाही सवाल खड़े करती है।

गुटखे के रैपर और गंदगी से घिरा परिसर

विद्यालय परिसर के मैदान और बरामदों में जगह-जगह गुटखा और पान मसाले के खाली रैपर पड़े मिले। कई स्थानों पर धूल और गंदगी भी दिखाई दी। स्वच्छ विद्यालय अभियान के दावों के बीच यह स्थिति चिंताजनक नजर आई। जब टीम प्राचार्य कक्ष पहुंची तो वहां कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं मिला। कार्यालय में पंखे और लाइटें बेवजह चल रही थीं। कैमरा पहुंचते ही कर्मचारियों ने स्विच बंद कर दिए, लेकिन किसी ने सामने आकर जवाब देना उचित नहीं समझा।

डीईओ बोलीं—जांच होगी

पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी रोहिणी पवार ने कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी और तथ्य सामने आने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। हालांकि विद्यालय में सामने आई गंभीर अनियमितताओं की जवाबदेही किसकी होगी, इस पर स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया।

बड़ा सवाल

सरकार ने करोड़ों रुपये इसलिए खर्च किए थे कि सरकारी स्कूलों के बच्चे भी आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर सकें। लेकिन यदि…

  • बच्चों से झाड़ू लगवाई जाए,
  • शिक्षक समय पर कक्षा में न पहुंचें,
  • प्रयोगशालाएं बंद पड़ी रहें,
  • परिसर गंदगी से भरा हो,
  • शिक्षक पढ़ाने के बजाय मोबाइल पर व्यस्त हों,
  • और जिम्मेदार अधिकारी ही अनुपस्थित मिलें…

तो क्या ऐसे विद्यालय वास्तव में उत्कृष्ट शिक्षा का मॉडल बन पाएंगे, या फिर करोड़ों की योजनाएं केवल भवनों तक सिमटकर रह जाएंगी?

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