नेपानगर। शहर की प्यास बुझाने वाला सबसे बड़ा जल शोधन संयंत्र पिछले करीब छह महीने से बंद पड़ा था। गर्मी बढ़ रही थी, पानी की मांग बढ़ रही थी और नगर में संकट की आशंका लगातार गहराती जा रही थी। हालात ऐसे बन रहे थे कि आने वाले दिनों में पेयजल आपूर्ति चरमरा सकती थी। लेकिन ठीक इसी समय नेपा लिमिटेड ने वह कर दिखाया, जिसकी उम्मीद बाहर से विशेषज्ञ एजेंसियों से की जा रही थी संस्थान ने लगभग 60 साल पुराने जल संयंत्र को अपने ही संसाधनों से दोबारा चालू कर दिया। इससे शहर को संभावित जल संकट से राहत मिली और लाखों रुपये का अतिरिक्त खर्च भी बच गया।
नगर की पूरी पेयजल व्यवस्था नावथा स्थित जल शोधन संयंत्र पर टिकी हुई है। यही संयंत्र लंबे समय से तकनीकी खराबी के कारण बंद था। पुराने सिस्टम में लगातार आ रही दिक्कतों के कारण मशीनरी ठप हो चुकी थी और पानी की सप्लाई प्रभावित होने लगी थी। जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा था, वैसे-वैसे संकट की आशंका भी गहरी होती जा रही थी।
बाहर की कंपनी ने खर्च बताया भारी, भीतर की टीम ने चुनौती स्वीकार की
संयंत्र की मरम्मत के लिए पहले निर्माता कंपनी से संपर्क किया गया। वहां से सर्वे, इंजीनियरिंग निरीक्षण, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता सहित मरम्मत पर भारी खर्च का अनुमान दिया गया। साफ था कि यदि बाहरी एजेंसी से काम कराया जाता तो संस्थान को लाखों रुपये खर्च करने पड़ते। इसके बाद संस्थान के भीतर ही निर्णय लिया गया कि पहले तकनीकी समाधान अपने स्तर पर खोजा जाएगा। मुख्य महाप्रबंधक कार्य राम अलागेसन के मार्गदर्शन में यांत्रिकी विभाग को जिम्मेदारी सौंपी गई। यहीं से शुरू हुआ एक महीने तक लगातार चलने वाला तकनीकी अभियान।
वर्कशॉप में बने पार्ट्स, पुरानी मशीनों में फिर दौड़ी ताकत
संस्थान की मैकेनिकल वर्कशॉप में खराब हिस्सों के विकल्प तैयार किए गए। उपलब्ध मशीनों, औजारों और तकनीकी अनुभव का उपयोग कर टीम ने एक-एक यूनिट को खोलकर जांचा। जहां पार्ट्स उपलब्ध नहीं थे, वहां नए पार्ट्स तैयार किए गए। जहां सिस्टम जाम था, वहां मैकेनिकल री-अलाइनमेंट किया गया। लगातार लगभग एक महीने की मेहनत के बाद संयंत्र फिर चालू हो गया। मशीनें शुरू होते ही नगर की जलापूर्ति सामान्य होने लगी और जो संकट सामने दिखाई दे रहा था, वह टल गया।
1966 का प्लांट आज भी शहर की धड़कन
जनसंपर्क अधिकारी संदीप ठाकरे के अनुसार यह संयंत्र वर्ष 1966 में हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा स्थापित किया गया था। इतने पुराने सिस्टम को फिर चालू करना आसान नहीं था, क्योंकि मूल तकनीकी संरचना पुरानी है और कई हिस्से अब बाजार में आसानी से उपलब्ध भी नहीं होते।
नरेश सिंह के आने के बाद बदलने लगा संस्थान का माहौल
संस्थान में नवागत सीएमडी नरेश सिंह के नेतृत्व में कामकाज की गति बढ़ी है। लंबे समय से अटके तकनीकी कार्य अब प्राथमिकता पर पूरे किए जा रहे हैं। हाल ही में नवीनीकृत संयंत्रों का परीक्षण केंद्रीय भारी उद्योग मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल के सामने सफलतापूर्वक किया गया। इसके बाद आयोजित वेंडर मीट में देशभर के सप्लायर्स ने भी संस्थान में नए व्यावसायिक अवसरों को लेकर रुचि दिखाई।
इन कर्मचारियों ने मशीनें चलाईं, शहर को संकट से निकाला
इस तकनीकी अभियान में यांत्रिकी विभागाध्यक्ष महेंद्र केशरी, प्रबंधक विजय चौधरी, उप प्रबंधक पिंटू कुमार गौतम, वरिष्ठ फिटर उमाकांत पाटिल, युवराज पाटिल, उमेश पाटिल, अमितेश थानेकर, अखिलेश गौतम, गणेश जाधव, विजय महाजन, मीनराज बैरवा, हितेश चौधरी, विकास सोनवने, देवीदास चौधरी, अभियंता पंकज पाटिल, विक्रांत बरने, विशाल चौधरी, मैकेनिकल वर्कशॉप प्रभारी किसन चौधरी सहित नावथा ट्रीटमेंट प्लांट, विद्युत और सिविल विभाग की टीम शामिल रही।
उद्योग ने फिर निभाई सामाजिक जिम्मेदारी
नेपा लिमिटेड का यह कदम केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि शहर के प्रति उसकी सामाजिक जिम्मेदारी का भी मजबूत उदाहरण माना जा रहा है। जब संकट सामने था, तब समाधान भी संस्थान के भीतर से ही निकला।