बुरहानपुर। दिव्यांगजन कल्याण के दावों के बीच सामाजिक न्याय विभाग की जमीनी हकीकत ने संवेदनशील व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राम बोरसल निवासी दिव्यांग मनोज मधुकर महाजन पिछले करीब तीन-चार साल से ट्राइसिकल के लिए विभागीय दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। मंगलवार को वह एक बार फिर जनसुनवाई में पहुंचा, लेकिन तत्काल राहत के बजाय उसे फिर दस्तावेज जमा कराने और कैंप लगने का इंतजार करने की बात कही गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस विभाग का काम दिव्यांगों को सहारा देना है, उसी विभाग के जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में ट्राइसिकल धूल खाती नजर आई। केंद्र में पुरानी ट्राइसिकल के साथ एक नई ट्राइसिकल भी रखी हुई दिखी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जरूरतमंद दिव्यांग दर-दर भटक रहा है और सरकारी सहायता दफ्तर में पड़ी-पड़ी धूल खा रही है, तो जिम्मेदार कौन है?
बोरसल से पैदल पहुंचा मनोज, बोला—हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है
ग्राम बोरसल के रहने वाले मनोज मधुकर महाजन ने बताया कि वह निःशक्त है और उसे आने-जाने में काफी परेशानी होती है। ट्राइसिकल मिलने से उसकी रोजमर्रा की जिंदगी आसान हो सकती है, लेकिन पिछले तीन-चार साल से वह इसके लिए संघर्ष कर रहा है। मनोज ने बताया कि वह कई बार सामाजिक न्याय विभाग पहुंचकर आवेदन दे चुका है। हर बार अफसर उसे आश्वासन देकर लौटा देते हैं। मंगलवार को भी वह बोरसल से पैदल बुरहानपुर जनसुनवाई में पहुंचा। उसने अधिकारियों से अपनी समस्या बताई और ट्राइसिकल दिलाने की मांग की, लेकिन इस बार भी तत्काल समाधान नहीं हो पाया। अफसरों ने उसके दस्तावेज लेकर कैंप लगने पर ट्राइसिकल उपलब्ध कराने की बात कही। मनोज ने कलेक्टर हर्ष सिंह से भी मुलाकात की। कलेक्टर ने समस्या का जल्द निराकरण करने का आश्वासन दिया। अब मनोज को उम्मीद है कि शायद इस बार उसकी सुनवाई हो जाए।
विभाग में ट्राइसिकल मौजूद, फिर भी जरूरतमंद को इंतजार क्यों?
जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में ट्राइसिकल धूल खाती नजर आना पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है। जब विभाग में एक नई ट्राइसिकल भी रखी दिखाई दे रही है, तो सवाल यह है कि पात्र जरूरतमंद को तत्काल राहत क्यों नहीं दी जा रही। दिव्यांग व्यक्ति के लिए ट्राइसिकल केवल एक वाहन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का आधार है। इससे वह घर से बाहर निकल सकता है, अपने काम कर सकता है और दूसरों पर निर्भरता कम कर सकता है। ऐसे में वर्षों तक किसी दिव्यांग को सिर्फ कैंप के इंतजार में रखना विभागीय संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
सेवा नहीं दे पा रहे तो विभाग बंद कर दें
मामले को लेकर समाजसेवी प्रियांक सिंह ठाकुर ने सामाजिक न्याय विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि विभाग दिव्यांगों और जरूरतमंदों के लिए बना है, लेकिन जब जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर सहायता नहीं मिल रही और विभाग में ट्राइसिकल धूल खा रही है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि सामाजिक न्याय विभाग सेवाएं नहीं दे पा रहा है, तो ऐसे विभाग की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जरूरतमंदों को कागजी प्रक्रिया और कैंप के नाम पर सालों तक भटकाना अमानवीय है।
उप संचालक बोले—भारत सरकार से अनुमति के बाद लगेगा कैंप
इस मामले में सामाजिक न्याय विभाग के उप संचालक दुर्गेश कुमार दुबे ने कहा कि पहले ट्राइसिकल वितरण के लिए कैंप आयोजित होते थे, लेकिन फिलहाल भारत सरकार ने कैंपों पर रोक लगा रखी है। एलिम्को अभी कैंप अरेंज नहीं कर पा रही है। इसके लिए सांसद के माध्यम से भारत सरकार को पत्र भिजवाया गया है। दुबे ने बताया कि मंत्रालय से जैसे ही एलिम्को को पत्र जाएगा, कैंप आयोजित किया जाएगा। संबंधित व्यक्ति के दस्तावेज लेकर रखे जाते हैं। आगामी समय में जब भी कैंप आयोजित होगा, ट्राइसिकल वितरित कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि कलेक्टर के माध्यम से भी दो बार पत्र भेजे जा चुके हैं और निचले स्तर पर भी प्रयास जारी हैं।
बड़ा सवाल: क्या मदद के लिए कैंप ही एकमात्र रास्ता है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कैंप नहीं लग रहे हैं, तो जरूरतमंदों को राहत देने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई। क्या विभाग पात्रता जांच कर उपलब्ध ट्राइसिकल को तत्काल जरूरतमंद को नहीं दे सकता। क्या दिव्यांग व्यक्ति को सहायता पाने के लिए वर्षों तक सरकारी प्रक्रिया का इंतजार करना पड़ेगा। मनोज महाजन का मामला केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं है। यह उस सिस्टम की तस्वीर है, जहां जरूरतमंद व्यक्ति पैदल चलकर जनसुनवाई तक पहुंचता है और सरकारी सहायता दफ्तर में रखी रहती है। कागज पूरे होते हैं, आवेदन लिए जाते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन राहत समय पर नहीं मिलती।
दफ्तर में संसाधन, जमीन पर बेबसी
दिव्यांग पुनर्वास केंद्र का उद्देश्य दिव्यांगों को सहायता, उपकरण और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन जब केंद्र में उपकरण मौजूद दिखाई दें और पात्र व्यक्ति बाहर भटकता रहे, तो व्यवस्था की जवाबदेही तय होना जरूरी है। अब देखना यह होगा कि कलेक्टर के आश्वासन के बाद मनोज को ट्राइसिकल कब मिलती है। विभाग कैंप का इंतजार करता है या मानवीय आधार पर तत्काल राहत देने का रास्ता निकालता है।