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कांग्रेस में बवाल: फर्जी वोटिंग पर मीडिया में बोले 4 नेता, नोटिस जारी… 24 घंटे में दो पर से हटा

- युवक कांग्रेस चुनाव में फर्जी वोटिंग का मामला गरमाया, संगठन महामंत्री ने कार्रवाई कर मचाया हड़कंप – बाद में दो नेताओं को क्लीनचिट

बुरहानपुर। युवक कांग्रेस चुनाव में फर्जी वोटिंग के आरोप ने कांग्रेस संगठन के भीतर भूचाल ला दिया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संगठन प्रभारी महामंत्री डॉ. संजय कामले ने पार्टी विरोधी बयान देने पर जिले के चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया। लेकिन महज 24 घंटे बाद ही इनमें से दो नेताओं के नोटिस निरस्त कर दिए गए, जिससे राजनीति में हलचल और भी तेज हो गई।

16 सितंबर को जारी नोटिस में कांग्रेस नेता हर्षित सिंह ठाकुर, एनएसयूआई अध्यक्ष सोहराब कुरैशी, आईटी सेल जिलाध्यक्ष भावेश तोमर और कांग्रेस नेता देवेश्वर सिंह ठाकुर का नाम शामिल था। नोटिस में लिखा गया था – फर्जी वोटिंग को लेकर आपने मीडिया के सामने पार्टी विरोधी बयान दिए। यह अनुशासनहीनता है। सात दिन में स्पष्टीकरण दें, अन्यथा कार्रवाई होगी।

अगले ही दिन पलटी कांग्रेस – दो नोटिस निरस्त

17 सितंबर की शाम नया पत्र जारी हुआ। देवेश्वर सिंह ठाकुर और हर्षित सिंह ठाकुर के नोटिस रद्द कर दिए गए। कारण बताया गया कि जिला प्रभारी ग्यारसीलाल रावत की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों नेताओं द्वारा कोई अनुशासनहीनता नहीं की गई। यानी एक दिन पहले जारी हुआ नोटिस खुद संगठन ने वापस ले लिया।

निजी स्कूल में मचा था चुनावी हंगामा

करीब दो माह पहले निमाड़ वैली के निजी स्कूल में युवक कांग्रेस चुनाव हुआ था। आरोप लगे कि पूर्व विधायक हमीद काजी के बेटे नूर काजी ने फर्जी वोटिंग कराई। हिंदू लड़कियों को मुस्लिम नाम देकर वोट डलवाने तक की बात सामने आई। लड़कियों से ओटीपी वाले मोबाइल लाने को कहा गया। पालक और हिंदू संगठन भड़क गए, गणपति नाका थाने तक मामला पहुंचा। थाने के बाहर सड़क पर धरना-नारेबाजी हुई। इसी दौरान कांग्रेस नेताओं ने मीडिया में बयान दिए थे, जिससे संगठन में अंदरूनी शिकायतें हुईं।

बड़ा सवाल: अनुशासन या अंदरूनी राजनीति?
  • पहले संगठन ने 4 नेताओं पर सख्ती दिखाई।
  • फिर 24 घंटे में ही 2 नेताओं को क्लीनचिट मिल गई।
  • इससे साफ है कि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और गुटबाजी एक बार फिर सतह पर आ गई है।
कांग्रेस में सियासी हलचल

इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय राजनीति में चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या नोटिस देना और फिर निरस्त करना सिर्फ पार्टी के अंदर दबाव का असर था या वास्तव में जांच के आधार पर हुआ फैसला?

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