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शिक्षा की दुर्दशा LIVE: जर्जर भवन में स्कूल, कबाड़ में किताबें; पिपराणा की शिक्षा पर सिस्टम खामोश!

झोपड़ी में लगती है कक्षा, पक्के कमरे पर ग्रामीणों का कब्जा, कबाड़ में सड़ रहीं किताबें… एक शिक्षिका के भरोसे चल रहा पूरा स्कूल बुरहानपुर। जिले का आदिवासी बाहुल्य इलाका धूलकोट। यहां के पिपराणा गांव में बच्चों की शिक्षा व्यवस्था मजाक बनकर रह गई है। स्कूल है, लेकिन इमारत जर्जर। कमरे हैं, लेकिन कब्जे में। […]

  • झोपड़ी में लगती है कक्षा, पक्के कमरे पर ग्रामीणों का कब्जा, कबाड़ में सड़ रहीं किताबें… एक शिक्षिका के भरोसे चल रहा पूरा स्कूल

बुरहानपुर। जिले का आदिवासी बाहुल्य इलाका धूलकोट। यहां के पिपराणा गांव में बच्चों की शिक्षा व्यवस्था मजाक बनकर रह गई है। स्कूल है, लेकिन इमारत जर्जर। कमरे हैं, लेकिन कब्जे में। शिक्षक हैं, लेकिन संख्या इतनी कम कि पूरा स्कूल एक शिक्षिका के भरोसे चल रहा है। गांव के 1 से 8वीं तक के करीब 80 से ज्यादा बच्चे रोजाना मौत के साए में पढ़ाई करने आते हैं। कोई झोपड़ी में बैठता है, कोई दरारों से भरी दीवार के नीचे। ऐसा लगता है जैसे सरकार ने सिर्फ कागजों पर स्कूल खोला है।
Sadaiv Newsजब हमारी टीम गांव पहुंची तो आंखें खुली की खुली रह गईं। प्राथमिक कक्षाएं झोपड़ी में लग रही थीं, जबकि एकमात्र पक्का कमरा ग्रामीणों के घरेलू सामान से भरा हुआ था। कमरे के बरामदे तक में चारपाई और अनाज के बोरे रखे मिले। कक्षा 6 से 8 की पढ़ाई पास ही स्थित एक जर्जर भवन में हो रही है, जिसकी दीवारों में मोटी दरारें और छत से टपकता पानी साफ नजर आया। बरसात में बच्चे किताबें बचाते हैं या जान?
सिर्फ एक शिक्षिका, वो भी पिछले कई सालों से अकेले ही पढ़ा रही
माध्यमिक स्कूल (कक्षा 6-8) की जिम्मेदारी सिर्फ एक महिला शिक्षिका पर है। उन्होंने बताया, मैं कई वर्षों से अकेले ही तीन कक्षाओं को पढ़ा रही हूं। बार-बार रिपोर्ट भेजी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। ये शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अफसरों की नाकामी है। प्राथमिक कक्षाओं (1-5) में तीन शिक्षक हैं, लेकिन संसाधन इतने कमजोर कि पढ़ाई नाम मात्र की ही हो पा रही है।
कबाड़ में पड़ी किताबें, बारिश आई तो बहेगी पढ़ाई
Sadaiv Newsइस विद्यालय में बच्चों को अब तक नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बावजूद पाठ्यपुस्तकें नहीं मिलीं। जो किताबें आई थीं, उन्हें जर्जर कबाड़ भवन में डाल दिया गया, जहां बारिश का पानी कभी भी उन्हें बहा सकता है। बच्चे खाली हाथ स्कूल आते हैं, और शिक्षिका कभी ब्लैकबोर्ड से तो कभी पुरानी किताबों से पढ़ाने की कोशिश करती हैं।
प्लास्टिक की झोपड़ी के बगल में बना अस्थायी शौचालय, सुरक्षा नहीं सिर्फ समझौता
Sadaiv Newsस्कूल परिसर में एक कच्चा, प्लास्टिक ढंका अस्थायी शौचालय बना है, जो झोपड़ी से बिल्कुल सटा हुआ है। हाइजीन और सुरक्षा जैसी चीज़ें यहां नाम मात्र को भी नहीं हैं। बच्चियों के लिए ये एक और डर की वजह है। यहीं नहीं यहां ना तो पीने का पानी है और ना ही किसी प्रकार से कोई मूलभूत सुविधा। एक अतिरिकक्ष है वह भी ग्रामीणों का शिकार, ग्रामीणों ने यहां अपना सामान भर रखा है।
शिक्षा अधिकारी बोले– अवगत नहीं थे, कब्जा हटवाएंगे…
इस संबंध में जब जिला शिक्षा अधिकारी संतोष सिंह सोलंकी से बात की गई, तो उन्होंने माना कि, जर्जर भवन में पढ़ाई कराना गलत है। बीआरसी और डीपीसी को रिपोर्ट भेजी जाती है। ग्रामीणों के कब्जे को हटाने की कार्रवाई करेंगे।
डीपीसी ने धमकी दी– शिक्षक पर कार्रवाई होगी!
वहीं डीपीसी रविंद्र महाजन ने कहा, यदि स्कूल जर्जर भवन में चल रहा है, तो संबंधित शिक्षक पर कार्रवाई की जाएगी। हमने पहले ही सख्त निर्देश दे दिए थे। लेकिन सवाल यह है कि शिक्षिका तो खुद अकेली जूझ रही है, दोषी कौन – सिस्टम या मजबूरी में काम कर रही महिला?
अब सवाल यह– कब सुधरेगा सिस्टम?
• क्या बच्चे ऐसे ही झोपड़ी और जर्जर भवनों में पढ़ाई करते रहेंगे?
• क्या प्रशासन को किसी हादसे का इंतज़ार है?
• क्या शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागज़ों में रहेगा?
बुरहानपुर का पिपराणा आज सिस्टम की नाकामी का आईना है। अगर अब भी कोई कदम नहीं उठाया गया, तो कल हम एक हादसे की रिपोर्ट बना रहे होंगे… जिसमें बच्चे, शिक्षक और अभिभावक – सब हार चुके होंगे।

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